७१. पत्र : छगनलाल जोशीको
मौनवार [४ मार्च, १९२९][१]
कल शामको बड़े आरामसे कलकत्ता पहुँच गये। हमें एक पूरा डिब्बा ही दे दिया गया था। पगली रुक्मिणी हमारे साथ ही है। उसके बापने तो उम्मीद छोड़ दी है। लेकिन उसे छोड़ देनेकी मेरी हिम्मत नहीं हुई। महादेव अभी पहुँचा नहीं है। अभी सुबह सात बजे हैं।
भाई जवाहरलाल नेहरूको ५०० रुपये संयुक्त प्रान्तके अकालके लिए बिड़ला कोषसे भेज दो। इलाहाबाद में यह पैसा कृपलानीकी मार्फत इस्तेमाल किया जायेगा।
मैं देखता हूँ कि अभीसे सब लोग खादीकी कमी अनुभव कर रहे हैं। हम तो समुद्र में बिन्दु-मात्र हैं। किन्तु जितनी ज्यादा खादी हम बना सकें, उतनी बनानी चाहिए। चलालामें ज्यादा बना सकें तो बनाने दें। तुम जो भेजोगे वह तो फौरन खप जायेगी।
आश्रमके सभी विभागों का काम और हिसाब ठीक-ठाक कर लो। यह जरूरी है कि हम किसी तरफसे भी भयभीत न रहें। प्रत्येक वस्तुके बारेमें निश्चय कर लेनेसे हम बहुत-सी मुसीबतोंसे बचेंगे।
अपने स्वास्थ्यका खयाल रखना।
बापूके आशीर्वाद
पद्मावतीकी आँखें डा॰ हरिलालकी[२] डिस्पेन्सरीमें दिखाकर चश्मेका नम्बर ले लेना। नम्बर सीतलासहायको भेज देना। उसके अनुसार चश्मा बनवाकर वहाँ भेज देगा।
तोतारामजी की आँखें ठीक हो गई होंगी। गंगादेवीके लिए सूर्यस्नानका प्रबन्ध कर दिया होगा।
बापू
- गुजराती (जी॰ एन॰ ५३९०) की फोटो-नकलसे।