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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/११८

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७५. अग्नि-संस्कारका धर्म

[५ मार्च, १९२९][]

ठीक १७ मार्चको यह लेख पाठकोंके हाथमें होगा। मैं इसे कलकत्तासे रंगून जाते हुए जहाजमें बैठे-बैठे लिख रहा हूँ। अतः श्रद्धानन्द पार्क में ४ मार्चके दिन जोकुछ हुआ उसका दृश्य अभी भी मेरी आँखोंके सामने खड़ा है। आशा है कि जो आग उस दिन उस पार्क में सुलगी है वह लाखों सिपाहियोंकी लाठियोंसे भी नहीं बुझ सकेगी।[]

क्योंकि धर्म किसीके मिटाये मिट नहीं सकता। एक बात मनुष्यके हृदयमें प्रकट होनेके बाद उसके शरीरके नष्ट होनेपर भी उसका नाश नहीं होता। दुनियाके अवतारों, पैगम्बरों, सन्तों, औलियाओंने जिस धर्माग्निको सुलगाया था वह उनके शरीरके न रहनेपर भी आजतक सुलग रही है।

लेकिन कहनेवाले कहेंगे, कपड़ा जलाना भी कोई धर्म है? मेरी नम्र सम्मति में कपड़ा जलाने का यह धर्म एक ऐसा धर्म है, जो सिद्ध किया जा सकता है। जिस देहमें प्राण नहीं रहता उसे तो हम जला डालते हैं या दफन कर देते हैं। जो चीज छूत लगनेके कारण दूषित हो जाती है उसे भी हम जला देते हैं। जिसे शराब छोड़ने लायक मालूम होती है, वह उसे छोड़ देता है। और फिर शराब चाहे जितनी कीमती हो तो भी, जिस चीजको वह स्वयं पापपूर्ण समझकर छोड़ चुका है, उसे दूसरोंके हाथों बेचकर वह पापका भागी नहीं बनेगा। जो चीज किसी संक्रामक बीमारीके कारण कीटाणुयुक्त हो गई हो वह भी जला दी जाती है; उसे जलाना धर्म माना गया है। जिस समय जोहानिसबर्ग में महामारीका प्रकोप शुरू हुआ तो वहाँकी नगरपालिकाने बिना किसी झिझक और दुखके शहरके बाजारके कीमती मकान और दुकानोंमें भरी हुई मेवा वगैरा बहुमूल्य चीजें देखते-देखते जलवा डालीं; उन्हें जलाना ही उसने अपना धर्म समझा। इन सब चीजोंको जलानेकी जरूरतके बारेमें मतभेद हो सकता है, लेकिन जो ऐसे काम करनेकी जरूरतको महसूस करता है, उसके विरोधी भी इस बातको मंजूर करेंगे कि उसके लिए तो अग्नि-संस्कार जैसे धर्म ही बन जाता है।

इसी तरह मेरी नम्र रायमें हरएक भारतवासीका यह धर्म है कि वह अपने विदेशी कपड़े जलाये और मैं मानता हूँ कि कलकत्ताकी पुलिसके उस उद्धत और क्रूरतापूर्ण बरतावके बादसे इस धर्ममें दुगुना जोर आ गया है। जिन्हें इस घटनाके पहले विदेशी कपड़े जलाने की जरूरतके बारेमें कुछ शंका थी, इस घटनाके बाद उन्हें बिलकुल ही शंका नहीं करनी चाहिए।

  1. गांधीजी ५ मार्चको सुबह रंगूनके लिए रवाना हुए थे।
  2. पुलिसने विदेशी कपड़ोंकी होलीको उस दिन लाठियोंसे पीट-पीटकर बुझानेका प्रयत्न किया था और इस प्रकार जनताको उत्तेजित करके लोगोंपर भी लाठियाँ चलाई थीं।