जिस विदेशी वस्त्रने हमारे देशको कंगाल बनाया है, जो हर साल हमारे देशसे ६० करोड़से भी ज्यादा रुपया विदेशों में खींच ले जाता है, उस विदेशी कपड़ेका बहिष्कार करना हमारा धर्म है; इस बारेमें तो किसीको शंका नहीं है। अगर यह बात सच है तो फिर बहिष्कृत कपड़ेका सिवा जलानेके और क्या किया जा सकता है? कुछ लोग कहते हैं, उसे गरीबोंको दे डालो। इस तरहके विचार रखनेवाले यह नहीं देख पाते कि अपने इन विचारोंके कारण वे गरीबोंका और स्वयं अपना निरादर करते हैं। गरीबोंको अपनेसे कम समझना उनका अपमान करना है, और गरीबोंको नीचे दर्जेका समझ कर खुद नीचे दर्जेका बनना है, स्वयं अपनी अवगणना करना है। क्या गरीब स्वाभिमानी नहीं होते? क्या उन्हें स्वराज्य नहीं चाहिए? जिस चीजको हम छूत-भरी वस्तु समझें, उसोको किसी दूसरेके हाथों किस तरह सौंप सकते हैं? गरीबों को जूठन देनेकी ओछी वृत्ति तो आज हममें है ही। क्या इसी ओछी वृत्तिको बहिष्कृत कपड़े गरीबोंमें बाँटकर हम और बढ़ायें, उसे उत्तेजन दें?
इन कपड़ोंके बारेमें हम थोड़ा विचार करें। आजतक जो कपड़े मैंने जलाये हैं, उनमें रूमाल, मैली या अच्छी काली टोपियाँ, नेकटाई, कालर, मोजे, महीन कुर्ते, वास्कट और महीन साड़ियाँ आदि होते हैं। इनमें की कौन-सी चीजें गरीबोंको दी जायें? गरीबों में उन्हें पहनने का शौक पैदा करना कितनी अजीब बात होगी? इस तरह के कार्यसे हम विदेशी वस्त्रके बहिष्कारको कबतक और कैसे सफल बना सकेंगे?
और आखिर श्रद्धानन्द पार्क में उस दिन जो कुछ हुआ उसके बाद तो विदेशी कपड़े को जलानेके औचित्यके बारेमें किसीके मनमें शंकाका लेश भी नहीं बचना चाहिए। पुलिसको मैंने पहले ही चेता दिया था कि विदेशी कपड़े जलानेके सिलसिले में मेरा इरादा किसी कानूनको तोड़नेका नहीं था। जब वकीलोंने भी यह राय दी कि शासनने जिस कानूनको धाराके मुताबिक कपड़े न जलानेका आदेश दिया है और उस धाराका पुलिसने जो अर्थ लगाया है वह ठीक नहीं है, मैंने उसके बाद ही उस पार्क में कपड़े जलानेका निश्चय किया था। इतना होते हुए भी जब पुलिसने विशेषतः लोगोंको चिढ़ानेको दृष्टिसे आग बुझानेका असफल प्रयत्न किया, तो लोगों में जोश फैल गया और उन्होंने पार्क में जगह-जगह कपड़े जलाने शुरू किये; और इसी सिलसिले में पुलिस और जनताके बीच थोड़ी मार-पीट भी हो गई। पुलिसकी इतनी मनमानीके बाद भी अगर देशके घर-घर और गाँव-गाँव में विदेशी कपड़ोंकी आग न जले तो मेरी राय में इससे देशकी हर तरह नाक कटेगी। पुलिसकी इस करतूतके बाद बहिष्कारको सफलताके बारेमें जहाँ लोगोंको अविश्वास था वहाँ अब उनमें आशाका उदय होना चाहिए।
- [गुजरातीसे]
- नवजीवन, १७-३-१९२९