७७. पत्र : रामनारायण पाठकको
६ मार्च, १९२९
आज रंगून जाते हुए ही तुम्हारे पत्रका उत्तर दे पा रहा हूँ। किसानोंके पास से चन्दा इकट्ठा करना भी एक कला है। इस कलाको जाननेवाले सेवक हमारे यहाँ कम ही हुए हैं। फिर किसानोंके पाससे धन जमा करनेसे पहले उन्हें धन देना जरूरी है। साहूकारोंको तो चन्दा देना ही चाहिए। यही दलील आश्रमपर भी लागू होती है। फिलहाल तो साहूकारोंके सम्पर्क में आयें, उनका मन पिघलायें और उनसे जो कुछ भी प्राप्त हो वह लें। इसमें सारा मध्यम वर्ग आ जाता है।
मोहनदासके वन्देमातरम्
आश्रम, छाया
- गुजराती (सी॰ डब्ल्यू॰ २७८५) से।
- सौजन्य : रामनारायण पाठक
७८. पत्र : मथुरादास पुरुषोत्तमको
६ मार्च, १९२९
तुम्हारे पत्रका 'नवजीवन' में उपयोग किया था; किन्तु तुम्हें पत्र लिखनेका इरादा था। अब रंगून जाते हुए ही ऐसा कर पा रहा हूँ।
तुम्हारा पत्र आये हुए कोई तीन महीने हो गये हैं। इस बीच तो तुम्हारे व्रतकी और भी अच्छी तरह कसौटी हो गई होगी। मुझे सब हाल खोलकर लिखना। मुझे हर समय लगता है कि इस व्रत के पालनके लिए सतत जागृत रहनेकी आवश्यकता है। दूसरे संयमोंके पालनमें हम तनिक भी ढीले पड़ें तो उसका असर ब्रह्मचर्य पालनपर पड़ता है। कहीं सारी इन्द्रियोंका काम किसी एक ही इन्द्रियका दास बनकर रहना तो नहीं है। क्योंकि वे बरतती तो कुछ ऐसे ही हैं। इसलिए हमें इन्द्रियोंको इस दासताके बन्धनसे छुड़ाना है। ऐसा करनेसे काम-वासना निराधार और दीन बनकर रह जाती है।
आँखके रोहे कटवा लिए होंगे; यदि रोहे सचमुच नष्ट हो गये होंगे तो उससे आँखको भी लाभ होगा।