अथक परिश्रम कर रहे हैं। परिषद् भारतके तमाम देशभक्त पुत्रों और पुत्रियोंसे आग्रह करती है कि वे स्वयं हिन्दी भाषा सीखें और केन्द्रीय कोषमें चन्दा दें और इस प्रकार इस आन्दोलनकी सहायता करें।
उक्त प्रस्तावको श्रीयुत ए॰ शंकर पुडुवाल, बी॰ ए॰, बी॰ एल॰ ने प्रस्तुत किया था। श्री एच॰ करुणाकर नैयरने उसका अनुमोदन और श्री एच॰ डी॰ कामतने समर्थन किया था।
इस प्रस्तावको प्रकाशित करके मैं अपना, सेठ जमनालालजीका या प्रस्तावसे सम्बन्धित लोगोंका विज्ञापन नहीं कर रहा हूँ। दक्षिणमें हिन्दी-प्रचारके बारेमें मुझे कितनी दिलचस्पी है सो हर कोई जानता है। जब मैं १९१५ में भारत लौटा उसके पहले ही से सेठ जमनालालजी हिन्दीके पक्के प्रेमी बन चुके थे। दक्षिण भारतकी उनकी यात्राने वहाँके हिन्दी-प्रचारके कार्यको नया उत्तेजन दिया है। प्रस्तावको पेश करनेवालोंको उनके कार्यका पुरस्कार उसी समय मिल गया जब वे अपने परिचित श्रोताओंके सामने प्रस्तावको पेश करने, उसका अनुमोदन और समर्थन करने खड़े हुए थे। प्रस्तावके साथ ही उनके नाम छापनेका आशय केवल सार्वजनिक रूपसे यह आशा व्यक्त करना है कि जिन सज्जनोंका प्रस्तावसे सम्बन्ध है, वे खुद प्रस्तावकी दो मुख्य बातोंका पालन करते हैं, यानी वे स्वयं हिन्दी सीख रहे हैं और धनसे केन्द्रीय कोषकी सहायता भी कर रहे हैं। मैं इस घटनाको लेकर एक मोटी बातकी छाप लोगोंके दिलपर डाल देना चाहता हूँ। जहाँतक इन सज्जनोंका सम्बन्ध है, यह बहुत सम्भव है कि वे हिन्दीके ज्ञाता हैं और केन्द्रीय कोषमें बराबर चन्दा देते रहते हैं। लेकिन इस बात से अभी हम इनकार नहीं कर सकते कि आज भी हममें ऐसे प्रस्ताव पेश करने, उनका समर्थन करने और उन्हें पास करनेकी आदत बनी हुई है, जिन्हें हम खुद कभी अमल में लानेकी इच्छा नहीं रखते। अगर हम उन प्रस्तावोंका समर्थन न करें, उनके अनुकूल मत न दें जिन्हें अमल में लानेकी न तो हमारी इच्छा है और न योग्यता हो, तो मैं समझता हूँ, इससे हम राष्ट्रकी प्रगति में सहायक होंगे और अपना बहुत-कुछ समय और कष्ट बचा सकेंगे। मुझे मालूम है कि जहाँ-जहाँ सेठ जमनालालजी और श्रीयुत राजगोपालाचारी गये हैं वहाँकी सभाओंमें पूर्वोक्त प्रस्ताव जैसे प्रस्ताव पास किये गये हैं। अगर उन-उन स्थानोंके सब सज्जन इन प्रस्तावोंपर उसी ढंगसे अमल भी करने लगें तो हिन्दी-प्रचारका काम दिन दूना रात चौगुना बढ़ने लगे और उसे धनकी भी कमी न रहे।
- [अंग्रेजीसे]
- यंग इंडिया, ७-३-१९२९