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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/१४

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आठ

चाहती थी। बादमें गांधीजीने लिखा : सत्यवतीपर जो-कुछ घटित हुआ है वैसा हजारों हिन्दू घरोंमें हर रोज घटित होता है। यह शाप हिन्दू समाजपर तब तक लगता रहेगा जबतक कि समाज विधवाओंको अक्षम्य दासतामें जकड़े रहेगा (पृष्ठ ३३५)।

गांधीजीने मानव-जातिकी सेवामें अपना सारा जीवन अर्पित कर दिया था। मानव-मात्रकी सेवाके माध्यमसे स्वयं मोक्ष प्राप्त करनेकी दिशामें उन्होंने जो व्यक्तिगत तपश्चर्या की उसका इस खण्डमें पर्याप्त दृष्टांत मिलता है। हरिलालसे मनमुटाव होनेके बाद वे अपने पौत्र, रसिकका पालन-पोषण स्वयं कर रहे थे और उसे राष्ट्रकी सेवाके लिए प्रशिक्षित कर रहे थे। रसिककी असामयिक मृत्यु हो जानेपर लिखते हुए गांधीजीने कहा : "मौतके बारेमें मेरे जो विचार हैं उनके कारण रसिककी मृत्युसे मुझे दुःखका अनुभव नहीं हुआ है, और जो थोड़ा दुःख हुआ भी है वह निरे स्वार्थवश... इस दृष्टिसे उसकी मौत मुझे ईश्वरके और भी अधिक समीप ले जाती है, और पहलेकी अपेक्षा ज्यादा जोरोंसे मुझे मेरी जिम्मेदारीका भान कराती है" (पृष्ठ १५)। अपनी बर्मा-यात्राके समाप्त होते-होते मीराबहनको पत्र लिखते हुए गांधीजीने कहा : "डाक्टर मेहतासे बिछुड़नेका मुझे दुःख होगा। मैं देख रहा हूँ कि यहाँ रहूँ तो उन्हें आराम दे सकता हूँ। लेकिन यह तो एक ऐसा निजी सौभाग्य है, जिसका सुख मैं नहीं ले सकता" (पृष्ठ १६९)।

लेकिन गांधीजीकी अनासक्तिकी सबसे कठोर परीक्षा तो आश्रममें घटी घटनाओंमें हुई। मगनलालकी एक वर्ष पूर्व मृत्यु हो जानेके बादसे गांधीजी आश्रममें और अधिक नैतिक तथा सामुदायिक अनुशासन लागू करनेमें अधिकाधिक रुचि ले रहे थे। लेकिन अधिकांश अन्तेवासियोंके लिए शायद यह चीज उनकी सामर्थ्यसे बाहर सिद्ध हुई। संकटकी घड़ी उस समय उपस्थित हुई जब अप्रैलमें आश्रमके दो सह-कार्यकर्त्ताओंके नैतिक पतनकी और कस्तूरबा द्वारा आश्रमका एक नियम भंग करनेकी बात गांधीजीके ध्यानमें लाई गई। आश्रमकी बदनामीकी जोखिम उठा कर भी गांधीजीने इन चूकोंके बारेमे 'नवजीवन' में 'मेरा दुःख, मेरी शर्म' शीर्षकसे एक लेख लिखा (पृष्ठ २११-१४)। उन्होंने मीराबह्नको लिखा : "इन बातोंका भंडाफोड़ होनेसे हमारा लाभ ही हुआ है" (पृष्ठ २६४)। और घनश्यामदास बिड़लाको पत्र लिखकर उन्होंने इसे 'दोषके जाहिर स्वीकारका मीठा अनुभव' (पृष्ठ ३२५) बताया।

गांधीजीने इन चूकोंकी जिम्मेदारी अपने ऊपर ओढ़ ली। उन्होंने कहा : "आश्रममें जो पाप होते हैं, वे मेरे पापोंकी प्रतिध्वनियाँ हैं" (पृष्ठ २२३)। उनके मनकी व्यथा इस प्रश्नमें फूट निकलती है : "लेकिन मैं कहाँ जाऊँ, क्या करूँ? निकल भागूँ? आत्महत्या करूँ? भूखों मरूँ? आश्रममें ही गड़ जाऊँ? सार्वजनिक कामके