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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/१४४

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९८. पत्र : रिचर्ड बी॰ ग्रेगको

दुबारा नहीं पढ़ा

स्थायी पता:
सत्याग्रह आश्रम
साबरमती
९ मार्च, १९२९

प्रिय गोविन्द,

मुझे तुम्हारे पत्र बड़े नियमित रूपसे मिलते रहे हैं और उनसे मुझे हालचालको ज्यादा अच्छी तरह समझने में मदद मिली है, जो अन्यथा सम्भव नहीं था। यह तो एक बहुत अच्छी बात हुई कि कुछेक ठोस कारणोंकी वजहसे मुझे अपनी यूरोप तथा अमेरिकाकी भावी यात्रा रद करनी पड़ी। मैं नहीं जानता कि मैं यूरोपमें भी कुछ ज्यादा अच्छा काम कर पाता कि नहीं, क्योंकि एन्ड्रयूजसे प्राप्त ताजा खबरके मुताबिक तो लगता है कि अमेरिका जाना बेकार साबित होता लेकिन यदि मैं यूरोप चला जाता तो अच्छा रहता। फिर भी, मैं जानता हूँ कि पश्चिम यात्राको रद करना मेरे लिए बड़ी बुद्धिमानीकी बात थी। मेरे खयालमें बहुत-सी बातोंके लिए मेरा यहाँ रहना जरूरी है। अगर तुम कृष्णदासकी पुस्तकको संक्षिप्त करनेका समय निकाल सको और मैकमिलन ऐंड कम्पनीको उसे प्रकाशित करनेके लिए राजी कर सको तो बड़ा अच्छा होगा।

मैं इस समय बर्मा में हूँ। यह स्थान मुझे बहुत ज्यादा आकर्षित करता है। यहाँ के निवासी बहुत ही सीधे-सादे बहुत उदार हैं, लेकिन फिर भी इनका बहुत अधम ढंगसे शोषण होता रहा है। सबसे ज्यादा दुख तो इस बातका है कि ये लोग अपने शोषणका प्रभावकारी ढंगसे विरोध नहीं कर पाते।

बापू

अंग्रेजी (जी॰ एन॰ ४६६१) की फोटो-नकलसे।