आपको थोड़ी-बहुत कामचलाऊ सलाह देनेके लिए भी मेरे पास पर्याप्त सामग्री है तो मैं आपकी सेवाके लिए तैयार रहूँगा।[१]
- [अंग्रेजीसे]
- यंग इंडिया, ४-४-१९२९
१०१. मुझे दी गई सीख
"फौजदारी कानूनका उल्लंघन" नामक लेख पढ़कर एक सज्जन लिखते है:[२]
आपके पास बहुत-सी विधवाएँ हैं। ... आपको ... समाजका भय है। अगर न हो तो आप लोगोंके सामने विधवा-विवाहका कोई उदाहरण क्यों नहीं रखते? ...
मेरे पास अनेक जवान विधवाएँ रहती हैं और सो भी इस तरहकी हैं जैसे मेरी सगी बेटियाँ हों। लेकिन उनका विवाह करनेमें न तो मैं समर्थ हूँ और न कोई दूसरा। मैं देखता हूँ कि आजकल जो कुछ पढ़ा जाता है, बड़ी लापरवाहीके साथ पढ़ा जाता है; लोग पढ़ी हुई बातोंपर गम्भीरतापूर्वक विचार करनेको तैयार नहीं दिखाई देते। विधवा-विवाह सम्बन्धी मेरे लेखोंमें मर्यादा निहित है। जो विधवा बच्ची है, जिसका विवाह उसकी इच्छाके बिना किया गया है, जो विवाह कर देनेसे खुश होगी, ऐसी विधवाका विवाह कर देना पुण्य हैं, यही मेरे लेखका आशय था। समझदार विधवाको जबर्दस्ती या समझा-बुझाकर ब्याह देनेका मेरा आशय हो ही नहीं सकता। मेरे साथ जो विधवाएँ रहती हैं, उनके आसपास ब्रह्मचर्यका वातावरण है। वे समझदार हैं। वे जानती हैं कि उन्हें पुनर्विवाह करनेकी स्वतन्त्रता है। वे बड़ी आजादी के साथ अपनी इच्छा मुझपर प्रकट कर सकती हैं। मैं इससे ज्यादा कुछ कर ही नहीं सकता; इससे आगे न मैं जाता हूँ और न यही चाहता हूँ कि दूसरा कोई जाये।
जिन बाल-विधवाओंको मैं जानता हूँ, उनका विवाह कर देनेकी कोशिश मैं कर रहा हूँ। लेकिन यह सहज ही नहीं हो पाता। माँ-बाप उन्हें अपनेसे दूर नहीं होने देते; न फिरसे उनका विवाह करते हैं, न उन्हें करने देते हैं। इन मामलोंमें माता-पिताका अंकुश घातक होता है और धर्मके नामपर अधर्मको बढ़ानेवाला होता है। वे रूढ़िकी जंजीरसे जकड़े हुए हैं, इस कारण पिसते रहते हैं। वे यह नहीं जानते कि उनके आश्रय में पड़ी हुई बालाएँ भी उन्हीं की तरह पिसी जा रही हैं। मैं तो यहाँतक आशा लगाये बैठा हूँ कि मेरे साथ रहनेवाली कुमारियाँ और जवान विधवाएँ किसी दिन अपनी तपश्चर्याके बलसे बाल-विधवाओंके बन्धन तोड़ेंगी। वे स्वयं विवाह करके