कोई उत्तम आदर्श उपस्थित नहीं कर सकतीं। वे तो स्वेच्छासे ब्रह्मचर्यका पालन करके ही बालिकाओंके बन्धन काटने की शक्ति पा सकती हैं।
- [गुजरातीसे]
- नवजीवन, १०-३-१९२९
१०२. भाषण : गुजरातियों की सभा, रंगूनमें
१० मार्च, १९२९
हम हिन्दुस्तान के किसी भी भाग में जायें वहाँ गुजराती और मारवाड़ी मिल जाते हैं। यहीं दोनों कौमें चाहें तो खादीका व्यापार भी कर सकती हैं। फिर भी यहाँ रंगून में खादी-भण्डार चलाने में बड़ी कठिनाई हो रही है, यह एक बड़ी शर्मकी बात है। यहाँ एक भी गुजरातीका खादीधारी न होना तो असहनीय ही है। आप सब तो पूर्णतया स्वतन्त्र हैं। जो लोग व्यापार करते हैं उनके लिए तो खादी न पहनने का कोई कारण ही नहीं है। जो अंग्रेजी पेढ़ियोंमें काम करते हैं यदि उन्हें यह डर हो कि खादी पहननेसे नौकरी चली जायेगी तो नौकरी छोड़ देनेमें ही उनका कल्याण है। मुझे हर गुजरातीसे यह आशा है कि इतने वर्षोंकी शिक्षाके बाद उसमें नौकरी छोड़ देनेकी हिम्मत आ गई होगी। आपमें से कितने लोग 'नवजीवन' पढ़ते हैं? (काफी हाथ ऊपर उठाये गये।) गुजरातियोंमें भी 'नवजीवन' न पढ़नेवाले व्यक्ति मौजूद हैं, यह देखकर मुझे आश्चर्य हो रहा है। मैं यह नहीं पूछना चाहता कि कितने लोग 'नवजीवन' खरीदते हैं, क्योंकि आप लोग 'नवजीवन' खरीदते हैं या नहीं, मुझे इसकी चिन्ता नहीं है। ईश्वरकी कृपासे उसे कभी घाटेपर नहीं चलाना पड़ा; हालाँकि जितना वह पहले बिकता था उतना अब नहीं बिकता। गुजराती 'नवजीवन' चलाते ही रहेंगे, इस विषय में मुझे तनिक भी शंका नहीं है। फिर आपमें से ज्यादातर लोग 'नवजीवन' पढ़ते हैं इसलिए खादीके बारेमें मैं आपसे ज्यादा कुछ नहीं कहना चाहता।
आपकी शालाके विषय में मैं आपसे एक बार चर्चा कर चुका हूँ; आज फिर कुछ कहना चाहता हूँ। आपको अपनी पाठशालाकी शोभा बढ़ानी चाहिए। उसे और सजाना चाहिए। शुद्ध परमार्थ नामकी तो कोई वस्तु दुनियामें है ही नहीं। सब प्रकारके परमार्थ में स्वार्थका अंश रहता है। किन्तु जिस स्वार्थके साथ दूसरोंका स्वार्थ भी सकता हो उसे हम परमार्थके नामसे जानते हैं। मैं खादीकी जो बात कहता हूँ वह इसी प्रकारका परमार्थ माना जायेगा; किन्तु इस शालामें तो आपका स्वार्थ है। आपके व्यापार और व्यवहारके लिए जितने ज्ञानकी आवश्यकता है, यह ज्ञान प्राप्त करनेकी पूरी-पूरी सामग्री आपकी इस शालामें होनी चाहिए। आज तो हम किरायेके सभा-भवन में बैठे हैं। आपके पास तो इससे भी बड़ा अपना सभा भवन होना चाहिए। मैं अंग्रेजोंके दोषोंको बहुत अच्छी तरह जानता हूँ। किन्तु उनमें कितने ही अनुकरणीय गुण भी हैं। वे भी व्यापार करने आये हैं और व्यापारियोंकी तरह रहते हैं। किन्तु