१०३. भाषण : रंगूनमें, आर्य-समाजियोंके समक्ष
१० मार्च, १९२९
मैं तो जहाँ-तहाँ अपने-आपको सनातनी हिन्दू कहता रहता हूँ, फिर भी आप मुझे आर्य समाजी मानते हैं, यह आपकी उदारता है। आपका इतना प्रेम देखकर मुझे आनन्द होता है। आर्य समाजके लिए मुझे कोई ऐसा-वैसा आदर नहीं है। आर्य-समाजकी विवादग्रस्त बातें समय आनेपर विस्मृत हो जायेंगी, लेकिन आर्य-समाज और महर्षि दयानन्दने हिन्दू-समाजकी जो सेवाकी है वह सदा अमर रहेगी। महर्षिने पुकार-पुकार कर हिन्दू-समाजके आगे ब्रह्मचर्यका मन्त्र रखा, भारतीय संस्कृतिके प्रचारपर जोर दिया और वेदोंके अभ्यासके महत्त्व की ओर सारे समाजका ध्यान खींचा। ऋषि की यह सेवा भूलने योग्य नहीं है, कोई उसे भूल नहीं सकता। वैसे आर्य समाज और हिन्दू-समाजकी जुदाई, उनके पृथक् अस्तित्वको बातमें मुझे ज्यादा सार नहीं मालूम होता। मेरे मत में, आर्य-समाज हिन्दू धर्मकी शाखा है और हरएक आर्य समाजी हिन्दू ही है। मैं आर्य-समाजियोंसे इतना ही कहूँगा कि आर्य-समाजियोंमें जिन-जिन गुणोंके होने का दावा किया जाता है, उनके होनेकी आशा रखी जाती है, वे सारे गुण जहाँ-जहाँ आप लोग हों वहाँ-वहाँ आपके जीवन में पाये जायें।
- हिन्दी नवजीवन, ४-४-१९२९
१०४. भाषण : रंगूनमें, भारतीय द्वारपालोंके[२] समक्ष
१० मार्च, १९२९
अगर आप अपने धन्धेमें किसी तरह की नीचता या बुराईका अनुभव करते हैं तो भूल करते हैं। जब आपके मालिकपर कोई आफत आती है तो न केवल उनकी दौलतकी बल्कि उनके कुटुम्ब और उनकी इज्जतकी रक्षाका भार भी आपको अपने हाथों में लेना पड़ता है। यह कोई ऐसी-वैसी जिम्मेवारी नहीं है। लक्ष्मणको रामचन्द्रकी दरवानी ही करनी थी न? आपको याद होगा कि द्वारपालका काम करते हुए जो घटना घटी थी उसके कारण लक्ष्मणने लड़ाईमें भाग लेकर अपने प्राणोंका मोह छोड़ा था, प्राणविसर्जनकी तैयारी की थी। लक्ष्मणने द्वारपालका काम कितना पवित्र माना था और उसके गौरवको कितना ज्यादा बढ़ाया था? अगर आप समझते हों कि दरबानका दर्जा नीचा है, तो मैं आपसे कहता हूँ कि ब्रिटिश सरकार अपने-आपको