संख्या यहाँ कितनी प्रतिशत है यह जाननेसे मुझे खुशी होती और यहाँके विद्यार्थियोंके जीवनका कुछ परिचय पाना भी मुझे अच्छा लगता। आप बर्मी हैं या भारतीय, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, आपने तो विश्व भरके विद्यार्थियोंके लिए उपयुक्त शब्द चुना है, वह शब्द है विद्यार्थी गणतन्त्र। आपने अपनेको अनुत्तरदायी कहा है। जबतक यह चीज सीमा में रहे तबतक तो ठीक है लेकिन जिस क्षण यह सीमासे परे हुई उसी क्षण आप विद्यार्थी नहीं रहेंगे। अपना शैक्षिक जीवन खत्म कर लेनेपर कोई व्यक्ति विद्यार्थी नहीं रह जाता, ऐसी बात नहीं है। कुछ भी हो, अपने पिछले ४० वर्षके जीवनका अवलोकन करनेपर मैं देखता हूँ कि अपना अध्ययन समाप्त कर लेनेके बाद मैंने अपने विद्यार्थी जीवनकी ड्योढ़ीपर पहला कदम रखा था। जीवनका एक अनुभवी ज्ञाता होनेके नाते मुझसे आप इतना तो ग्रहण कर ही लीजिए कि बादके जीवनमें केवल किताबी शिक्षा आपके बहुत कम काम आयेगी। सम्पूर्ण भारतके विद्यार्थियों के साथ पत्र-व्यवहार करनेपर मुझे पता चला है कि ढेरों पुस्तकोंसे प्राप्त जानकारीको अपने दिमागों में ठूँस-ठूँसकर भरनेके कारण उन्होंने अपनेको तबाह कर लिया है। कुछ तो विक्षिप्त गये हैं। कुछ पगला गये हैं, और कुछ अपवित्रताका दयनीय जीवन व्यतीत कर रहे हैं। जब वे कहते हैं कि वे कितनी भी कोशिश कर लें, वे जैसे हैं वैसे ही रहेंगे, क्योंकि वे शैतानसे जीत नहीं सकते, तब मुझे उनसे सहानुभूति होती है। वे दुखके साथ पूछते हैं, "हमें बताइए इस बुराईसे कैसे बचा जाये। हमपर जो मैल चढ़ गया है, उसे कैसे धोया जाये।" जब मैंने उनसे कहा कि आप रामनाम लें, ईश्वरके सामने झुककर उसकी सहायता माँगें तो वे मेरे पास आकर कहते हैं, "हमें नहीं पता ईश्वर कहाँ है। न ही हम यह जानते हैं कि प्रार्थना क्या चीज होती है।" ऐसी है उनकी अधोगति जिसे वे प्राप्त हो चुके हैं। इसीलिए मैं विद्यार्थियोंसे कहता आ रहा हूँ कि अपने ऊपर नियन्त्रण रखो, जो भी साहित्य मिल जाये उस सबको न पढ़ो। मैं तो उनके शिक्षकोंसे भी कहता हूँ कि वे अपने हृदयोंका परिष्कार करें तथा विद्यार्थियोंके साथ एक दिली सम्बन्ध स्थापित करें। मैंने तो यह महसूस किया है कि शिक्षकोंका वास्तविक काम कक्षामें उतना नहीं है जितना उससे बाहर होता है। आजकलके मामूली जीवनमें जिसमें शिक्षक और प्रोफेसर केवल उतना ही काम करते हैं जितनी कि उन्हें तनख्वाह मिलती है, उनके पास इतना समय नहीं होता कि वे कक्षासे बाहर विद्यार्थियोंको समय दे सकें और यही चीज आजकलके विद्यार्थियोंके जीवन तथा चरित्रके विकास में सबसे बड़ी बाधा है। लेकिन जबतक शिक्षक कक्षासे बाहर अपना सारा समय विद्यार्थियोंको देने को तैयार नहीं हों तबतक इस सम्बन्धमें कुछ ज्यादा नहीं किया जा सकता। उनको चाहिए कि वे विद्यार्थियोंके मस्तिष्कोंको प्रशिक्षित करनेके बजाय उनके हृदयोंका विकास करें। उनको चाहिए कि वे छात्रोंको अपने शब्दकोशमें से उस हरेक शब्दको मिटाने में सहायता करें जो हतोत्साह और निराशाका सूचक है। मेरे दिलमें जो कुछ भी मरा हुआ है वह सब मैं आपके सामने उँडेलनेकी कोशिश कर रहा हूँ। मेरी प्रार्थना है कि आप तालियाँ बजा-बजाकर इसमें रुकावट न डालें। यह आपके और आपके दिलके बीच दीवारका काम करेगा। किसी भी पवित्र कार्यमें असफलता स्वीकार
पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/१५६
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