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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/१६

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दस

चाहिए बल्कि कोशिश यह होनी चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति जिस धर्मका माननेवाला है, उस धर्मका वह और अच्छा अनुयायी बने। गांधीजीने यह स्वीकार किया कि ईसाई लोकमत उनकी इस बातसे सहमत नहीं है, फिर भी उन्होंने कहा कि पैगम्बरोंने जो-कुछ कहा है वह कोरे शब्दोंमें नहीं बल्कि अपने जीवन और अपने आचरणके जरिये कहा है (पृष्ठ ६४)।

आत्म-नियंत्रणके लिए संघर्ष कर रहे नौजवानोंको सम्बोधित करके लिखे गये एक संक्षिप्त लेकिन मर्मस्पर्शी लेखमें गांधीजीने मनको बलवान और बुद्धिको शुद्ध बनानेके साधनके रूपमें 'गीता' और 'रामायण' का बारम्बार पाठ करनेकी सलाह दी। 'अन्त्यज सर्वसंग्रह' की समालोचना करते हुए अन्तमें उन्होंने यह लिखा : "सच्ची कला कभी निरुपयोगी नहीं होती। ... प्रकृतिकी कलाका कोई अन्त नहीं है।... कुदरतका कण-कण उपयोगी है। मोरके पंखका एक भी रंग निरुपयोगी नहीं है। यह हमारी त्रुटिकी निशानी है कि हम उनमेंसे हरएक का उपयोग करना नहीं जानते। इसमें दोष कुदरतकी स्वच्छंदताका नहीं है" (पृष्ठ ३५६)।