प्र॰- क्या आपका खयाल है कि सदाके लिए भारतका ही एक अंग बनकर रहना बर्माके लिए हितकर होगा?[१]
उ॰- मेरे लिए इस प्रश्नका उत्तर देना कठिन है। मैं इतना ही कह सकता हूँ कि बर्मा यदि समानताके आधारपर भारतका एक हिस्सेदार बनकर रहना चाहे और उसमें दोनों ही देशोंको इच्छानुसार अलग होनेकी पूर्ण स्वतन्त्रता रहे, तो यह बर्माके लिए हितकर ही रहेगा। मुख्य बात यह है कि बर्माको अपनी इच्छानुसार अपना भाग्य निश्चित करनेका सर्वथापूर्ण अधिकार रहना चाहिए।
प्र॰- क्या आपके विचारमें भारत के स्वराज्यवादियों द्वारा अपनायी गई नीति उस देशको अपनी वांछित शासन-व्यवस्था प्राप्त करनेमें सहायक होगी?
उ॰- जी, नहीं, मैं ऐसा नहीं सोचता।
प्र॰- क्या बर्मामें बसनेवाले भारतीय विदेशी वस्तुओंके बहिष्कारमें और बर्मी उद्योग-धन्धोंकी सहायता करनेमें बर्मी जनताका साथ देंगे?
उ॰- विदेशी वस्तुओंके नहीं, केवल विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारमें। सभी विदेशी वस्तुओंके बहिष्कारकी बात अव्यावहारिक है। हाँ, वर्तमान परिस्थितिमें विदेशी वस्त्रोंका बहिष्कार जरूर सम्भव है और इसे सम्पन्न करना आपके लिए अच्छा भी रहेगा। इस काम में भारत आपका साथ देगा और भारत यदि आपके देशी उद्योग-धन्धोंकी सहायता नहीं करता, तो वह एक निकम्मा पड़ोसी बन जायेगा।
प्र॰- बर्मामें अल्पसंख्यकोंको क्या संरक्षण दिया जाना चाहिए?
उ॰- वही जो भारत अपने यहाँके अल्पसंख्यकोंको देता है; बर्मामें बसनेवाले भारतीय अल्पसंख्यकोंको उससे अधिक कोई संरक्षण नहीं देना है। यदि हम अपने गुणोंके बलपर ही बर्मामें नहीं रह सकते तो हमें यहाँसे हट जाना चाहिए।
प्र॰- बर्मामें अपनी मनोवांछित शासन व्यवस्था प्राप्त करनेके प्रयासमें भारतीय और बर्मी जनता, दोनों ही के धनी और निर्धन, दोनों ही वर्गोंके लोगों का समान रूपसे सहयोग प्राप्त करनेके लिए आप हम दोनोंको क्या करनेकी सलाह देंगे?
उ॰- हमें एक-दूसरेके प्रति मैत्री और सद्भाव रखना और ऐसा ही व्यवहार करना चाहिए; सन्देह और अविश्वासकी भावनासे एक-दूसरेको नहीं देखना चाहिए। यदि किसी समाजमें चन्द धूर्त व्यक्ति हों तो पूरे समाज या समुदायको बुरा नहीं कहना चाहिए। प्रत्येक समुदायको दूसरे समुदायोंके साथ पड़ोसीकी तरह सहयोगकी भावनासे रहना चाहिए; दूसरोंपर प्रभुत्व जमानेकी कोशिश नहीं करनी चाहिए। इस प्रकार यह बात तो बिलकुल स्पष्ट है कि यदि कोई समुदाय अपने कल्पित हितोंके संरक्षणके लिए ब्रिटिश संगीनोंकी ताकतका भरोसा करेगा, तो उसके और अन्य समुदायोंके बीच कभी वास्तविक सहयोग नहीं हो सकता। सार रूपमें हमारी संस्कृति वही है जो आपकी, हालाँकि बाहरी रूपरेखामें अन्तर दिखता है। मैं चाहता हूँ कि इस क्षेत्रमें हम चीनके इतिहास से सबक हासिल करें, जहाँ कन्फूशियस पंथी, बौद्ध,
- ↑ यह प्रश्न और इसका उत्तर यंग इंडियासे लिये गये हैं।