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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/१६२

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

होनी चाहिए जो शत्रुपर आक्रमण भी कर सके और बर्माके एक कोनेसे दूसरे कोने तक जनताके हृदयमें अलख भी जगा सके। समूचे बर्मामें एक ऐसी ज्योति जग उठनी चाहिए कि वह वातावरण में व्याप्त सारी सुस्ती, काहिली और अपवित्रताको भस्म कर दे। आपकी प्रकृति आज इतनो शान्तिप्रिय है कि आप एक मक्खीको भी चोट नहीं पहुँचायेंगे; पर इतना ही तो पर्याप्त नहीं है। किसी भी व्यक्तिको फुंगियोंके वस्त्र धारण करनेका तबतक कतई कोई अधिकार नहीं जबतक कि वह मक्खीको लगनेवाली चोटकी पीड़ा स्वयं महसूस करके उस मक्खीको बचानेके लिए दौड़ नहीं पड़ता। आपने संसार त्यागकर धर्मका जीवन अपना लिया है। आपकी स्थितिमें पहुँचकर व्यक्तिको न शासक-सम्राटोंका भय रह जाता है और न जनताका ही; क्योंकि ऐसे व्यक्तिके लिए भोजन और वस्त्र मिलना न मिलना बराबर ही होता है। वह सदा ईश्वरीय आलोकमें रमता है, सत्यके प्रति उसके मनमें दृढ़ निष्ठा होती है। इसलिए उसे हर प्रकारके अन्याय, हर प्रकारकी अपवित्रता, असत्य और अत्याचारके विरुद्ध, जहाँ भी ये दिखाई पड़ें, सीना तानकर खड़े हो सकना चाहिए। मैं चाहता हूँ कि आप अपने अन्दर ऐसी ही आन्तरिक शक्ति पैदा करें।

[अंग्रेजीसे]
यंग इंडिया, २८-३-१९२९ और ट्रिब्यून, ९-४-१९२९
 

१०९. भाषण : मजदूरोंके बीच, रंगूनमें[]

१० मार्च, १९२९

आपको शायद मालूम नहीं होगा कि तिलक स्वराज्य कोष जमा करनेके दिनों मेरे सामने प्रस्ताव रखा गया था कि यदि मैं दस मिनटके लिए भी एक व्यावसायिक नाट्य-प्रदर्शनको देखने चला जाऊँ तो मुझे चन्देके रूपमें पचास हजार रुपये मिल सकते थे। पर मैंने मना कर दिया था। यह नहीं कि मुझे व्यावसायिक अभिनेताओं के बीच उठने-बैठनेसे नफरत है; क्योंकि मैं तो सभी वर्गोंक मनुष्योंके साथ भाईचारा जोड़ता हूँ। लेकिन मेरी स्थितिमें आनेपर मनुष्यके लिए जरूरी हो जाता है कि वह अपने व्यक्तिगत आचरणको ठीक रखनेके साथ ही साथ इस बातका खयाल भी रखे कि उसके आचरणका दूसरोंपर क्या प्रभाव पड़ेगा। सार्वजनिक नाटकघरोंमें जानके अन्य जो भी परिणाम हों, यह तो निश्चित ही है कि इस देशमें नाटकोंने अनेकानेक युवकोंका आचरण और चरित्र भ्रष्ट कर दिया है। आप पक्की उम्र के लोग चाहे अपनेको नाटकोंके दुष्प्रभावसे बिलकुल बरी मान लें, लेकिन आपको

  1. मजदूरोंकी ओरसे एक नाटकका आयोजन किया गया था और उससे होनेवाली आमदनी गांधीजीको चन्देके रूपमें देनेका वचन दिया गया था। गांधीजी समझ रहे थे कि उनको किसी मजदूर-प्रदर्शनमें ले जाया जा रहा है; वहाँ नाटक पाकर उनको आश्चर्य हुआ। यह भाषण महादेव देसाई और प्यारेलाल द्वारा प्रस्तुत गांधीजीके चर्माके दौरेके विवरणसे लिया गया है।