अपने छोटे-छोटे बच्चोंका भी तो खयाल करना चाहिए जिनको आपत्तिजनक नाटकोंमें ले जाकर आप उनके निर्दोष, निष्पाप मनके साथ कितना बड़ा अनाचार करते हैं। आप चारों ओर नजर तो डालिए। हमारे चारों ओर एक ज्वाला धधक रही है। वर्तमान व्यवस्थाके कुप्रभाव में पनपनेवाले सिनेमा, नाटक, घुड़-दौड़, शराबखाने और अफीमघर इत्यादिके रूप में समाजके ये सभी शत्रु चारों ओरसे मुँह बाए हमारी घात में खड़े हैं। तब यदि मैंने वर्तमान व्यवस्थाको शैतानियतकी व्यवस्था कहने में कोई संकोच नहीं किया तो क्या गजब कर दिया? इसीलिए आपको मेरी यही सलाह है कि अपने मार्गके अन्धकूपोंसे सावधान!
और अभिनयको अपना पेशा बना लेनेवालो, आप लोगोंको मेरी सलाह है कि भले ही आप अपना पेशा जारी रखें, पर हाँ आचरणकी शुद्धि बनाये रखिए। मैं जानता हूँ कि आपके सामने बड़े-बड़े प्रलोभन आते रहते हैं। तब यदि आप अपना चरित्र शुद्ध बनाये रखने में डगमगाने लगें तो ईश्वरके लिए एक क्षणकी दुविधाके बिना अपने पेशेको लात मार दीजिए। ईश्वर आपकी सहायता करेगा। मजदूर सदा ही अपनी मजूरीका अधिकारी तो होता ही है।
- [अंग्रेजीसे]
- यंग इंडिया, २८-३-१९२९
११०. पत्र : मीराबहनको
रंगून
११ मार्च, १९२९
तुम्हारे चार पत्र मिले, जिनमें से तीन आज ही मिले। यहाँसे केवल तीन बार जहाज आते-जाते हैं। परन्तु तुम इसकी चिन्ता मत करो। मैं रंगूनसे एक ही बारम कई दिनोंके लिए बाहर नहीं जाता। मैं बर्मासे २१ तारीखको चल दूँगा--मुकदमे[१] में हाजिरीके लिए। आशा है कि मैं २४ तारीखको कलकत्ता पहुँच जाऊँगा और २६ को वहाँसे चल दूँगा।
इस बार तुमको जिस प्रकारकी आशंकाने घेरा था, वह शायद अनिवार्य ही ही है। जितनी सतर्कता रख सकती हो, रखो और यदि इसके बावजूद ऐसी स्थितिका सामना करना पड़ जाये तो घबड़ाओ मत। निराहार रहना निःसन्देह ही इसका सबसे सीधा और अचूक इलाज है। कमजोरी बढ़नेकी चिन्ता मत करो और आसानीसे जितना काम निबटा सकती हो, उससे ज्यादाको जिम्मेदारी अपने ऊपर मत ओढ़ो। 'शीघ्रता करो पर धीरे-धीरे।'
- ↑ मुकदमा कलकत्ताके प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेटको अदालत में २६ मार्च, १९२९ को होनेवाला था।