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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/१६७

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११५. पत्र : सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूजको

मौलमीन (बर्मा)
१२ मार्च, १९२९

तुम्हारा पत्र मुझे मिल गया। सचमुच तुम्हारा यह विचार बड़ा सुन्दर है कि इस बारका ग्रीष्मकाल तुम इंग्लैंडमें वहाँकी घटनाओंपर नजर रखते हुए बिताओ और किसी भी नई घटनाके[] लिए अपने आपको तैयार रखो।

यहाँ होनेवाली हर उथल-पुथलके बारेमें तुमको 'यंग इंडिया' से पता चलता रहेगा। आशा है वह तुमको नियमित रूपसे मिल रहा होगा।

कोल्हापुरकी तरह यदि फिर मुझे पलंगपर पड़ना ही पड़ा, तो फिर वही सही। वैसे मैं अपनी तरफसे कोशिश कर रहा हूँ कि जितनी शक्ति बचा सकूँ, बचाऊँ, लेकिन मैं यह भी महसूस करता हूँ कि मेरे ऊपर जो काम आ पड़ा है उसे मैं टाल तो नहीं सकता।

मौलमीनमें कामके भारी दबावके कारण मैं यह पत्र बोलकर लिखा रहा हूँ।

सी॰ एफ॰ एन्ड्रयूज महोदय
मार्फत श्रीमती एम्हर्स्ट
११७२, पार्क एवेन्यू
न्यू यार्क सिटी

अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३३७२) की फोटो-नकलसे।

 

११६. पत्र : प्रफुल्लचन्द्र घोषको

मौलमीन
१२ मार्च, १९२९

प्रिय प्रफुल्ल बाबू,

आपका पत्र मिल गया। आपका तार मिलते ही मैंने तार दे दिया था[] और मुझे आशा है कि डा॰ अन्सारी उसका उद्घाटन कर देंगे।

मैं २४ तारीखको कलकत्ता लौटूँगा और वहाँ २६ तक रहूँगा। अब विदेशी वस्त्रोंके बहिष्कारके सिलसिले में आपको किसी विशेष हिदायतकी जरूरत नहीं। उसमें

  1. एन्ड्रयूजने अपने ४ फरवरीके पत्रमें पूछा था : "क्या मेरे लिए यही ज्यादा ठीक नहीं रहेगा कि मैं वापस आनेपर इस बारकी ग्रीष्मऋतु इंग्लैंडमें ही बिताऊँ? मैं अपने देशवासियोंको यह समझानेकी जी-तोड़ कोशिश कर रहा हूँ कि भारतको औपनिवेशिक स्वराज्य देनेकी आवश्यकता इतनी तीव्र हो गई है कि उसमें विलम्ब नहीं किया जा सकता...।"
  2. तार उपलब्ध नहीं है।