१२१. पत्र : श्रीमती आर॰ सरदारखानको
स्थायी पता :
आश्रम
साबरमती
१२ मार्च, १९२९
आपका पत्र मिल गया। मनमें आपके साथ सम्वेदना पैदा हुई, क्योंकि हाल ही में मेरा भी एक पौत्र[१] नहीं रहा। वह परिवारमें सभीका लाडला था। परन्तु मैंने उसकी मृत्युसे यहीं सीखा है कि हमें अपने आपको ईश्वरेच्छापर छोड़ देना चाहिए। आखिर जन्म और मरण, वास्तव में अलग-अलग चीजें नहीं, एक ही तथ्यके दो पहलू हैं। और यदि ऐसा है, तो फिर दुःख क्यों मनाया जाये?
हृदयसे आपका,
- श्रीमती आर॰ सरदारखान
- ई॰ सी॰ एच॰ एस॰
- लुधियाना
अंग्रेजी (एस॰ एन॰ १३३७४) की माइक्रोफिल्मसे।
१२२. भाषण : गुजरातियोंकी सभा, मौलमीनमें
१२ मार्च, १९२९
आप लोग काममें जुटे हुए हैं। किन्तु मुझे आपसे भी ज्यादा काम है। इसलिए मेरा एक-एक क्षण मूल्यवान है, आप यह समझ लें। मुझे जब खबर मिली कि आप लोगोंने सिर्फ ५००० रुपये एकत्र किये हैं तब मुझे दुख हुआ। क्या आपको मालूम है कि मैं किसके लिए इतना भटकता हूँ? मैं बहुत थका हुआ हूँ और इस वर्ष तो थकावटकी कोई हद ही नहीं है। मैं बहुत चाहता हूँ कि आराम करूँ। किन्तु आराम कैसे ले सकता हूँ? मैं किसीको आराम करने दूँ तभी आराम ले सकता हूँ न? और मैं दूसरोंको आराम करने भी कैसे दूँ? जहाँ अपने घरमें आग लगी हो वहाँ पर चारपाईपर पड़े रहनेसे क्या होगा? आग लगी हो तो बीमार पड़ा हुआ मनुष्य भी बिस्तरसे उठ बैठता है और आग बुझानेका प्रयत्न करता है। आज तो पूरे देशमें आग सुलग रही है। पूरे देशकी आत्माका गला घोटा जा रहा है। किन्तु जो
- ↑ रसिक गांधी; देखिए "एक होनहार बालक", २१-२-१९२९।