हैदराबाद (सिन्ध) के विद्यार्थियोंने मुझे सिन्धी भाषामें एक सुन्दर मानपत्र दिया था। मैंने वचन दिया था कि उसका अनुवाद 'यंग इंडिया' में छापूँगा[१] लेकिन दूसरे कामोंके कारण वह इससे पहले छापा नहीं जा सका। मानपत्र इस तरह है:
हैदराबादके विद्यार्थियोंकी ओरसे हम आपका हार्दिक स्वागत करते हैं। हम जानते हैं कि आपके आदर्शोंका अनुसरण न करनेके कारण हम आपका स्वागत करनेके योग्य नहीं हैं। लेकिन हमें आशा है कि आपके मुँहसे कुछ उपदेश-वचन सुनकर हमारे दिलोंपर उनका गहरा असर होगा। हम आपको धोखा देना नहीं चाहते। हमारी इच्छा तो यह है कि हम अपना हृदय आपके सामने खोलकर रख दें।
हमारा शहर शिक्षाका केन्द्र है। भारतके दूसरे शहरोंके मुकाबले 'इंडियन सिविल सर्विस' में यहाँके लोग ज्यादा हैं। यहाँ एक कालेज, लड़कोंके तीन हाई स्कूल, लड़कियोंके दो हाई स्कूल और अन्य अनेक सिन्धी तथा अंग्रेजी स्कूल हैं। अकेले अंग्रेजी विद्यालयोंमें ही ४,००० विद्यार्थी हैं। लेकिन इनमें से सिर्फ २२ या २५ विद्यार्थी खादी पहननेवाले हैं और देशी मिलोंका कपड़ा पहननेवाले छात्रोंकी संख्या भी ३ या ४ प्रतिशतसे ज्यादा नहीं हो सकती। कुछ दूसरे, स्वदेशी, विदेशी दोनों पहनते हैं। लेकिन अधिकांश लड़के केवल विदेशी कपड़ा पहननेवाले हैं। आप भली-भांति जानते हैं कि हमारा रहन सहन खर्चीला है। हमें मातृ-भाषा और अपनी राष्ट्रीय संस्कृतिकी अपेक्षा अंग्रेजी भाषा और पाश्चात्य सभ्यताका ज्यादा मोह है। अपने रहन-सहन में हम कोई सेवा और सादगी भी नहीं दिखा सकते, हालाँकि हम अपने देशकी गरीबीको अच्छी तरह जानते हैं। हम जानते हैं कि खादी और स्वदेशी चीजोंके व्यवहारसे देशको लाभ होगा; लेकिन हमें दुख है कि बाढ़ पीड़ितोंका आर्तनाद सुनकर भी हमारे दिल डोले नहीं थे। चारों ओर भुखभरी और निराशाको देखकर भी हमारे हृदय पिघल नहीं जाते हैं, इसका कारण हमारी यही उपेक्षा-वृत्ति है। हमारा संघ पिछले चार वर्षोंसे कुछ काम कर रहा है, लेकिन उसमें भी ऐसा कुछ नहीं है जिसका हम गर्वसे उल्लेख कर सकें।
हमें अपने यहाँकी 'देती-लेती' की कुप्रथाका उल्लेख करते शर्म आती है। उच्च शिक्षा पानेके बावजूद अपनी पत्नीके माता-पिता या सम्बन्धियोंसे हजारों रुपये वसूल करनेमें हमें झिझक नहीं लगती। हममें से कई लोग अपनी पत्नियोंके घरवालोंसे रुपये लेना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं। हममें से बहुतोंके अन्दर थोड़ा भी स्वाभिमान नहीं है; उच्च शिक्षा पाते हुए भी सिर्फ, ५-६ लड़कियाँ ही ऐसी साहसी निकली हैं जिन्होंने अपने लिए पति 'खरीदने'
- ↑ देखिए "सिन्धके संस्मरण", २१-२-१९२९।