सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/१८१

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
१५१
टिप्पणियाँ

प्राप्ति सूचना तो भेज ही दी गई है,लेकिन राशि जमा करनेके अतिरिक्त इस पत्रका अलगसे अपना एक महत्त्व है। इसलिए कि अध्यापकोंने अपीलके शब्दोंपर ही नहीं,उसकी भावनापर भी अमल किया है, क्योंकि उन्होंने विदेशी वस्तुओं, यहाँतक कि चायके भी परित्यागका संकल्प कर लिया है। अध्यापकोंको मेरा सुझाव है कि विदेशी वस्तुओंके परित्यागके संकल्पको न तो अध्यापक निभा पायेंगे और न विद्यार्थी ही। इतना व्यापक संकल्प निभाया नहीं जा सकेगा उदाहरणके लिए न तो अध्यापक- गण और न विद्यार्थी लोग ही विदेशी पुस्तकों, विदेशी पिनों, विदेशी घड़ियों या विदेशोंमें बनी सुइयोंका ही परित्याग कर पायेंगे। इसलिए मेरा सुझाव है कि वे अपनी प्रतिज्ञापर पुनर्विचार करें। ज्यादा अच्छा यह होगा कि वे उन विदेशी वस्तुओंके नाम घोषित कर दें जिनसे वे दूर रहेंगे।

खादीके बारेमें तो मैं अनेक बार कह चुका हूँ कि वह तबतक हर कीमतपर सस्ती ही है जबतक उसे स्थानीय स्टाक रखनेका मामूली-सा खर्च जोड़कर लागत मूल्यपर ही बेचा जा रहा है। हमें याद रखना चाहिए कि खादीने अपने जीवनके सात वर्षोंमें अपनी कीमत आधी घटा ली है। यदि उसे और अधिक संरक्षण मिलता,तो कीमत और भी सस्ती हो जाती। और फिर गरीब विद्यार्थियोंको अपने पैरोंपर खड़े होना क्यों नहीं सिखाया जाता; उनको यह क्यों सिखाया जाये कि वे लागत मूल्यसे भी सस्ती दरपर खादी मिलनेकी अपेक्षा रखें और इस प्रकार अपनेसे कहीं गरीब तबके के लोगोंसे आर्थिक सहायता पानेकी अपेक्षा रखें? बालक-बालिकाओंको खाली समय में अपना सूत स्वयं कातनेकी शिक्षा देनी चाहिए। मैंने सुझाव दिया है कि वे प्रतिदिन लगभग आधा घंटा कताईको दें। वे तो उस सूतको बुन भी सकते हैं, या यदि उसमें मुश्किल पड़े, जो पड़ सकती है, तो वे उस सूतको अखिल भारतीय चरखा संघके किसी प्रतिनिधिके पास भेजकर उतने ही वजनकी तथा उतने ही नम्बरके सूतकी खादी ले सकते हैं। उनको केवल बुनाईका मामूली खर्च देना होगा।

उसकी जकड़में

आगराके एक मित्र पूछते हैं:

क्या आपने अपने जीवनका बीमा कराया है? क्या पाश्चात्य देशोंकी इस संस्थामें कोई आपत्तिजनक बात है? कुछ बीमा कम्पनियाँ अपनी सारी या अधिकांश आय सरकारी प्रतिभूतियोंमें नियोजित कर देती हैं। क्या ये कम्पनियाँ इस प्रकार जनताका धन लेकर उससे उसी सरकारकी मदद नहीं करतों--जिसे आप शैतानियतकी सरकार कहते हैं क्या वे इस प्रकार हमारा जीवन सरकारके आश्रित नहीं बना देतीं और इस प्रकार एक हव तक सरकारके स्थायित्वको बल नहीं देतीं? यदि यह ठीक है, तो क्या देश-भक्तों को ऐसी कम्पनियोंके प्रतिनिधि बनना या इन कम्पनियोंसे जीवन-बीमा कराना चाहिए?