दिया है। मैं मानता हूँ कि उनके गीतोंसे बहुत कुछ सीख सकत हैं। उनके गीतोंको काव्य माना जा सकता है या नहीं, इस झमेलेमें कौन पड़े? अथवा यही क्यों न मानें कि जिस रचनामें लोगोंको आगे ले जानेकी शक्ति हो वह काव्य ही है। जिसमें प्राण डालनेकी शक्ति न हो वह काव्य कैसा?
नवजीवन, १७-३-१९२९
१४२.पत्र:आश्रमकी बहनोंको
मांडले
मौनवार, १८ मार्च, १९२९
जहाँ लोकमान्यने 'गीता' की टीका लिखी, जहाँ लालाजी और सुभाष बोस कैद थे, उस शहरका नाम है मांडले। आज हम उसी शहरमें हैं। मैं तो यह सब देखनेके लिए नहीं जा सका, मगर और सबको भेजा है। यहाँ जिस परिवारमें ठहरे हैं, उसकी गृहिणी कोई साध्वी स्त्री है। धन बहुत है, पति जिन्दा है, बाल-बच्चे हैं, फिर भी रत्तीभर गहना नहीं पहनती। अपनी लड़कियोंको गहने पहननेको नहीं कहती। तेरह बरसकी एक लड़की है, जिसे उसने बीस बरसतक विवाहका विचारतक न करनेकी बात समझा दी है। उसके पास जो गहने थे, वे उसने मुझे दिलवा दिये हैं। वह आश्रमके और नियम भी पालती है। 'नवजीवन' नियमसे पढ़ती है; और यह नहीं कहा जा सकता कि वह कोई बहुत पढ़ी-लिखी महिला है।
तुम्हारे सब काम अच्छी तरह चल रहे होंगे।
बापूके आशीर्वाद
बापुना पत्रो-१: आश्रमनी बहेनोने