पत्र[१] भेजा है। यह पत्र जिस डाकसे रवाना होगा वह तो उसी जहाजसे जायेगी जो मुझे कलकत्ते ले जायेगा।
रंगूनमें आजके दिन भारतीय डाक मिलती है। अगर तुम्हारी कोई डाक हुई तो वह मुझे रंगूनमें बुधवारको जब मैं वहाँ पहुँचूँगा, मिल जानी चाहिए।
यह दिलचस्प दौरा खतम होने आ रहा है। डाक्टर मेहतासे बिछुड़नेका मुझे दुख होगा। मैं देख रहा हूँ कि यहाँ रहूँ तो उन्हें आराम दे सकता हूँ। लेकिन यह तो एक ऐसा निजी सौभाग्य है, जिसका सुख मैं नहीं ले सकता।
यद्यपि कुछ फेरबदल करनेकी जरूरत पड़ी है, फिर भी इस दौरेमें मेरी तबीयत अच्छी रही। हाजमा उतना अच्छा नहीं रहता जितना ठंडके मौसम में रहता है। यहाँका जलवायु कुदरती तौर पर नमीवाला है।
तुमको अब मेरा शेष कार्यक्रम मालूम हो गया है। मैं २६ तारीखको तुम्हें तार भेजने का खयाल रखूंगा। मैं एक्सप्रेस गाड़ीसे, जो दो बजे दिनको हावड़ासे चलती है, रवाना होनेकी पूरी कोशिश करूँगा।
सफरमें आज पहली बार मैंने काफी रुई धुनी ऐसा रोज कर सकूँ तो मुझे बहुत अच्छा लगेगा।
पता नहीं तुम्हें उद्योग मन्दिरसे कोई पत्र मिले हैं कि नहीं। तुम्हें वहाँके कुछ पुरुषों और स्त्रियोंसे सम्पर्क बनाये रखना चाहिए।
अभी इससे अधिक नहीं, क्योंकि मुझे एक सभामें जाना है।
सस्नेह,
तुम्हारा, बापू
सौजन्य: मीराबहन
१४५. भाषण: मांडलेकी सार्वजनिक सभामें[२]
१८ मार्च, १९२९
आप लोगोंने मुझे इस बातकी ठीक याद दिलाई है कि यहीं मांडलेमें भारतके महान सपूत लोकमान्य तिलकको जीवित दबाया गया था। उन्होंने ही भारतको स्वराज्यका मन्त्र दिया था, और उनको जीवित दबाकर ब्रिटिश सरकारने भारतको ही जिन्दा दफना दिया था। उसी प्रकार पंजाब केसरीको भी यहाँ बन्दी बनाया गया था, और ऐसा न हो कि हम वे सब बातें भूल जायें, इस खयालसे सरकारने हाल में ही श्रीयुत बोस और बंगालके बहुतसे सपूतोंको जिन्दा दफनाया है। इस प्रकार हम भारतीयोंके लिए तो मांडले एक तीर्थस्थान है और यह एक विचित्र संयोगकी बात है कि आज हम सब उसी दुर्ग और कारागारकी दीवारोंके सायेमें