बैठे हैं जिन्हें भारतके उन सपूतोंने पुनीत किया था। भारतमें यह एक आम कहावत है कि स्वराज्यका रास्ता मांडलेसे होकर गुजरता है तथा ब्रिटिश सरकारने भारतके महान सपूतों को यहाँ बन्दी बनाकर आप लोगोंको वह महत्त्वपूर्ण पाठ पढ़ा भी दिया है। स्वराज्यका मार्ग कष्ट सहनका मार्ग है। वास्तवमें कोई भी देश अपनी वर्तमान स्थिति में बिना कष्ट सहनके नहीं पहुँचा है और मांडले आपको और हमें, दोनोंको, उस महान् सत्यकी निरन्तर याद दिलाता रहेगा।
आप बुद्धको अपना गुरु मानते हैं, यह अच्छी बात है। उसी प्रकार अच्छा होगा कि आप अहिंसाकी असीम सम्भावनाओंकी खोज-बीन भी करें। आप कुछ ऐसी चीजें करते हैं जो मुझे बुद्धके उपदेशोंके अनुरूप नहीं लगीं, लेकिन इस समय मैं उनकी आलोचना करके आपके आतिथ्यका निरादर नहीं करना चाहता।
मैं समझता हूँ कि आपके पास एक ऐसा महान् सत्य है जो कि मानव जातिके एक अत्यन्त महान् गुरुने संसारको बताया है, और वह सत्य है अहिंसा। यदि सभा में बिलकुल खामोशी होती और वातावरण शान्त होता तो मैं उस सीधे-सादे सिद्धान्तके बारेमें आपको खुशी से बताता। इस स्थिति में तो मैं आपसे केवल यही कह सकता हूँ कि आप उस सिद्धान्तका अध्ययन करें और अपने जीवनके हर पहलूमें इसे व्यवहार-में लायें। यह सिद्धान्त उन मणियों और हीरोंसे कहीं अधिक श्रेष्ठ है जिन्हें लोग इतना महत्त्व देते हैं। यदि आप बुद्धिमत्तापूर्वक इसको व्यवहारमें लायें तो अहिंसाका यह सिद्धान्त आपका तथा मानवजातिका उद्धारक बन सकता है।
यंग इंडिया, १८-४-१९२९
१४६. भाषण: गुजरातियोंकी सभा, मांडलेमें
१८ मार्च, १९२९
बात तो सच है। [१] अहिंसाके मार्ग में एक ही व्यक्तिकी तपश्चर्या काफी होती है और वह दूसरोंको ढँक लेती है। उससे किसीका कपट या ढोंग छिप सकता है, ऐसा नहीं है, किन्तु उससे आसपासका वातावरण तो बदल जाता है। मेरी अहिंसा तो चारों तरफ चल रही हिंसामें उसी तरह सुशोभित है, जिस तरह वृक्षहीन स्थान-में एरंडका वृक्ष। नहीं तो मैं आपसे आग्रह क्यों करूँ? बहनोंसे आग्रह किसलिए करूँ? यदि मेरी अहिंसा सम्पूर्ण होती तो मेरी उपस्थिति से ही यहाँ गहने ऐसे उतरते चले आते जैसे शरीरसे मैल। मैं जिस दिन पूर्ण निर्दोष हो जाऊँगा उस दिन मेरी कलमसे शब्द निकलने से पूर्व उनपर अमल हो जायेगा।
नवजीवन, १४-४-१९२९
- ↑ नवजीवन पढ़नेवाली एक बहनने गांधीजीको आशीर्वाद दिया था: " नवजीवनमें तुम्हारा एक वाक्य भी देशको जागृत करनेके लिए पर्याप्त हो!"