१९ मार्च, १९२९
उत्तर देते हुए महात्मा गांधीने इस बातपर सन्तोष प्रकट किया कि पैसेकी कमीके कारण अन्य दूसरे काम न कर सकनेके बावजूद नगरपालिका मुफ्त शिक्षा दे रही है। उन्होंने कहा कि स्कूल जाते समय मुख्य बाजारसे गुजरते हुए मैंने देखा कि नालों में से दुर्गन्ध आ रही थी। उनकी तत्काल सफाई करनी चाहिए। यदि नगर-पार्षद सच्चे और ईमानदार हैं तो स्वयं उन्हें यह काम करना चाहिए। यहाँ तीन हाई स्कूल हैं, इसलिए लड़कोंको सफाई-कार्यका प्रशिक्षण देना चाहिए। यदि उन्हें इस कामपर लगा दिया जाये तो एक ही दिनमें सारे शहरको सफाई हो जायेगी।
इसके बाद महात्मा गांधीने बर्मियों तथा भारतीयोंको सलाह दी कि वे मित्रकी तरह रहें तथा भारतीयोंकी ओर संकेत करते हुए कहा कि वे बर्मियोंसे सम्बन्धित मामलों में रुचि लें तथा उनके साथ मिलकर काम करें।[१]
इस सभा के साथ ही साथ बर्माके भीतरी प्रदेशकी मेरी दिलचस्प और शिक्षाप्रद यात्रा भी समाप्त होती है। कुछ वर्ष पूर्व जब मेरी बर्मा-यात्रा केवल रंगूनतक तथा एक दिनके लिए मौलमीनतक ही सीमित रही थी तब भी बर्मी लोगोंके साथ मेरे दिन आनन्दपूर्वक बीते थे, लेकिन इस बार मांडलेतक की अपनी यात्राके दौरान मुझे जो अनुभव हुआ उससे मेरे उस आनन्दमें और वृद्धि हो गई है। इन सब सभाओं में बहुत-से पीत-वस्त्रधारी फुंगियों तथा बहुत सारे बर्मी बहनों और भाइयोंसे मिलकर मुझे काफी खुशी हुई है। चूंकि आगे आनेवाले कई वर्षोंकी दृष्टिसे, हमेशाके लिए न भी सही, इस प्रकारके श्रोताओंके सम्मुख दिया गया आजका भाषण आखिरी भाषण होगा, इसलिए मैं उस चीजके बारेमें कुछ कहना चाहता हूँ जो मुझे और आपको हृदयसे प्यारी है आपके अभिनन्दनपत्रोंमें, वे चाहे कहीं भी भेंट किये गये हों, मेरे अहिंसा तथा चरखेके सन्देशका जैसा समर्थन और सराहना की गई है वह बिना किसी उद्देश्य और अर्थके तो की नहीं जा सकती। अहिंसाके सन्देशसे मेरा क्या अभिप्राय है, इसकी व्याख्या करते हुए मैं आपसे कुछ शब्द कहूँगा मेरी दृष्टिमें तो यह विश्वकी सबसे सक्रिय शक्तियों में से एक है। यह उस सूर्यके समान है जो बिना नागा रोज आकाशमें उदित होता है। यदि हम इसकी ताकतको समझ लें तो यह करोड़ों सूर्योसे भी अधिक बढ़कर है। यह जीवन, प्रकाश, शान्ति और सुखका प्रसार करती है। जो देश अहिंसा के सिद्धान्तका समर्थक होनेका दावा करता है, वहाँ हम वह प्रकाश, वह जीवन, वह शान्ति और वह सुख क्यों नहीं देखते? जैसा कि कल मैंने
- ↑ यहाँ तककी रिपोर्ट २२-३-१९२९ के हिन्दुस्तान टाइम्ससे ली गई है। इसके आगेका अंश महादेव देसाई द्वारा लिखित गांधीजीकी बर्मा-यात्रा के विवरणसे लिया गया है।