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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/२०२

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

मांडले में कहा था, मुझे लगता है कि भगवान बुद्धका सन्देश बर्मी लोगोंके हृदयको सतही तौर पर ही स्पर्श कर पाया है। मैं एक या दो कसौटियाँ रखना चाहूँगा।‌ अब मैं मानता हूँ कि जहाँ अहिंसाका बोलबाला हो वहाँ ईर्ष्या, अनुचित महत्वाकांक्षा‌तथा अपराधके लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। आपके अपराध-सम्बन्धी आँकड़ोंका अध्ययन करनेपर मैंने देखा कि अपराधको दौड़में आप पीछे नहीं हैं। थोड़ा-सा बहाना मिलनेपर किसीकी हत्या कर देना बर्मामें मुझे एक आम बात लगती है। इसलिए अपने बायें बैठे मित्रों (फुंगियों)से‌ जो उस धर्मके, जिसे आप लोगोंने बुद्धसे ग्रहण किया है, संरक्षक समझे जाते हैं, मैं एक अपील करूँगा। लंकाकी यात्राके बाद और अब बर्मामें भी काफी घूम लेनेके बाद मैं यह समझता हूँ कि आपके यहाँ की अपेक्षा भारतमें हमने बुद्धकी शिक्षाओंपर ज्यादा अच्छी तरह अमल किया है, हालाँकि उतनी अच्छी तरह तो नहीं जितना कि कर सकते थे। हमारे शास्त्रोंमें लिखा है कि जब कभी अनैतिकता फैलती है, सज्जन पुरुष तथा ऋषि-मुनि तपस्या शुरू कर देते हैं, जिसे दूसरे शब्दों में कष्ट सहन कहते हैं। गौतमको जब अपने चारों ओर अत्याचार, अन्याय और मृत्यु दिखाई दी, जब उन्हें अपने आगे-पीछे तथा हर तरफ अन्धेरा ही अन्धेरा दिखने लगा तब वह वनमें चले गये और वहाँ प्रकाश प्राप्त करनेके लिए उपवास और प्रार्थना करते रहे। जब यदि ऐसे व्यक्तिको भी, जो हम‌ सबसे कहीं ज्यादा महान् था, प्रायश्चित्तकी जरूरत पड़ी तो फिर हम लोगोंके लिए, चाहे हम पीले कपड़े पहनते हों या नहीं, भला यह कितना जरूरी न होगा? मित्रो, यदि आप अहिंसाके उद्देश्यकी सिद्धि हेतु हतोत्साहित संसारका पथ-प्रदर्शन करनेवाले प्रकाश स्तंभ बनना चाहते हैं तो इसके लिए आत्म-शुद्धि तथा प्रायश्चित्तके अलावा और कोई चारा नहीं है। यहाँ बहुतसे पुरोहित बैठे हुए हैं। यदि उनमें से कुछ बुद्धके सन्देशको प्रतिपादित करनेका कार्य अपने हाथमें ले लें तो वे मानव-जीवनमें क्रान्ति ला देंगे। आपको चाहिए कि आप रूढ़ और जड़ हो चुकी परम्पराओंपर न चलें बल्कि अपने हृदय टटोलें, अपने धर्मग्रन्थोंमें लिखे शब्दोंके गूढ़ अर्थको पहचानें और अपने आसपास के वातावरणको सजीव बनाएँ। अपने हृदय‌ टटोलनेपर आप यह जान जायेंगे कि केवल पशु-हत्या न करना ही काफी नहीं है बल्कि यह भी जरूरी है कि उसे निरे जीभके स्वादके लिए खायें भी नहीं। तब आप तुरन्त यह भी समझ जायेंगे कि सब प्राणियोंसे प्रेम करनेका सिद्धान्त मुखको धुएँकी चिमनियाँ बनानेके भी विरुद्ध है। मैं जानता हूँ कि बर्मियों जैसे सीधेसादे लोगोंमें भी शराबका काफी प्रचलन बढ़ता जा रहा है, और सो भी ऐसी जलवायुवाले देशमें जहाँ‌ उत्तेजक शराब पीनेकी कोई आवश्यकता नहीं है, और अधिक आत्म-मंथन करनेपर आप तुरन्त देखेंगे कि जिस व्यक्तिके मन में हर प्राणीके लिए प्रेम हो, उसके मनमें भयकी कोई गुंजाइश ही नहीं है। आपको चाहिए कि स्वयं आप सत्ताधारीका भय छोड़ दें तथा अपने आस-पासके लोगोंको भी किसीसे न डरनेका पाठ पढ़ायें। आशा है कि हृदयसे उद्भूत जो कुछ शब्द मैंने आपसे नम्रतापूर्वक कहे हैं उन्हें आप उसी रूपमें ग्रहण‌ करेंगे जिस उद्देश्य से उन्हें कहा गया है। आप लोगोंने सभी सभाओंमें मुझे अहिंसा और सत्यकी