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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/२०५

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अहम्मन्यता और अज्ञान

ऐसे होंगे जो भारत और इस्लामके राजनीतिक उत्थानके लिए फकीरी अपनानेको तैयार रहेंगे। अन्तमें में समझता हूँ कि मैंने देशकी जो सेवा की है वह एक प्रकारसे धर्मकी सेवा ही है।

[अंग्रेजीसे]
अमृतबाजार पत्रिका, २२-३-१९२९

१५०.'पुरुषका हाथ'

निम्नलिखित लेखके लेखक, जिन्होंने लेखका शीर्षक 'पुरुषका हाथ' रखा है, लिखते हैं:[]

इस पत्रको भूमिकाके रूपमें मैं सिवा इसके और कुछ नहीं जोड़ना चाहता कि पाठकगण मशीन-पूजाके विरुद्ध दिये गये इस साक्ष्यको हृदयमें धार लेंगे जो पश्चिमके ही एक निवासी द्वारा दिया गया है और जिसे मशीन युगके कड़वे-मीठे, दोनों अनुभव प्राप्त हो चुके हैं पाठकको यह नहीं सोच लेना चाहिए कि लेखक और मैं सारी मशीनोंकी केवल इस कारण भर्त्सना करते हैं क्योंकि वे मशीन हैं विरोध तो मशीनों द्वारा मनुष्यके कार्योंका अपहरण करने और फलस्वरूप मनुष्यको अपना दास बनानेका है।

[अंग्रेजीसे]
यंग इंडिया, २१-३-१९२९

१५१. अहम्मन्यता और अज्ञान

अहम्मन्यता और अज्ञान प्रायः साथ-साथ रहते हैं। अर्ल विंटरटनमें तो हैं ही। इसका नवीनतम उदाहरण कलकत्ता में विदेशी कपड़ोंकी जो होली []कलकत्ता पुलिसके अकारण हस्तक्षेपकी वजहसे विश्वमें मशहूर हो गई है, उससे सम्बन्धित प्रश्नोंका इंग्लैंडके हाउस ऑफ कॉमन्समें दिये गये उनके उत्तरोंमें देखनेको मिलता है। नीचे मैं अर्ल महोदय द्वारा दिये गये उत्तरोंको तथा हरेक उत्तरके सामने उसके सही उत्तरको दे रहा हूँ:

  1. लेख तथा पत्र यहाँ नहीं दिये गये हैं। अपने लेखमें लेखकने, जो अमेरिकाके एक चित्रकार थे, यह बतलानेका प्रयत्न किया था कि गांधीजीने जो काम किया वह 'विश्वमें व्याप्त अमानवीय यन्त्रवादी आदर्शके विरुद्ध' एक मानवीय कार्य था।
  2. देखिए " भाषण: कलकत्ताकी सार्वजनिक सभामें", ४-३-१९२९।