सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/२१७

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
१८७
अन्त्यज क्या करें?

मनुष्यको उतना ही जबर्दस्त भौतिक सुख और फायदा भी पहुँचता है। हमें इस बातका नित्य अनुभव प्राप्त होता है।

[गुजरातीसें]
नवजीवन, २४-३-१९२९

१६०. अन्त्यज क्या करें?

एक अन्त्यज सेवक लिखते हैं:[] मैं तनिक भी ढीला नहीं पड़ा हूँ। मैं अपनी समझमें जिस तरीके से अस्पृश्यताको दूर करनेकी सम्भावना देखता हूँ उस तरीकेसे उसे मिटानेमें कुछ भी कसर उठा नहीं रखता। मैं देख रहा हूँ कि देशमें से अस्पृश्यताकी भावना घोड़ेके वेगसे भागी जा रही है। मैं रात-दिन कामना तो यह करता हूँ कि वह वायुवेगसे चली जाये, और मुझे विश्वास है कि किसी दिन जरूर ही वह वायुवेगसे निकल भागेगी। लेकिन तबतक के लिए धीरजकी जरूरत है। उक्त पत्रमें जिन अन्त्यज भाइयोंके उद्गार दिये गये हैं, वे समझ में आते हैं, लेकिन फिर भी उन्हें शान्तिसे काम लेना चाहिए। इस संसारमें सुधारकको सदासे शुरुआतमें अकेला रहना पड़ा है। अगर सुधारकको इच्छा करते ही साथी मिल जायें तो उस सुधारककी कीमत ही न रहे। अस्पृश्यता हमारे देशकी एक बहुत पुरानी बुराई है। और फिर इसे धर्मका चोगा पहना दिया गया है। ऐसी बुराईको मिटानेवालेको तत्काल सहयोगी मिलनेकी आशा नहीं रखनी चाहिए। इस दिशा में आजतक जो काम हो सका है, और जितने साथी इसके लिए मिल सके हैं, सो तो केवल प्रभुकी कृपाका ही फल है । इस अन्त्यज युवकको इतनी बात ध्यान में रखनी चाहिए कि जो शुचिता और सुधार उसने कष्ट द्वारा प्राप्त किये हैं वे लोगोंके लिए नहीं बल्कि उसके अपने लिए हैं। इस कारण इस शुचितामें से ही उसे शान्ति प्राप्त करनी चाहिए। जो यह मानता है कि लोग उसकी शुचिताकी कद्र करें, वह सचमुच शुद्ध नहीं हुआ है। शुद्धिका आधार तो सदा स्वयं हम हैं। दूसरे, इस युवकको चाहिए कि वह निराश होकर अन्य अन्त्यज भाइयोंको छोड़ न दे। जो लोग सदियोंसे कुचले जाते रहे हैं, उन्हें तेजस्वी बनते, जागृत होते थोड़ा समय जरूर लगेगा। उनके प्रति तो धीरज और प्रेमकी भावना बढ़ानेकी जरूरत है। जो शिक्षा और सुविधाएँ प्रस्तुत अन्त्यजभाईको मिली हैं वही सारे अन्त्यज समाजके लिए भी सम्भव हैं। अतः हमें उक्त अन्त्यज भाईकी उदासीनताको समझ लेना चाहिए। पत्थरके बारेमें इन भाईने एक बात कही है;[] मैं उन्हें दूसरी बातकी याद

  1. पत्र यहाँ नहीं दिया गया है। लेखकने अनुभवमें आये उदाहरण देते हुए यह कहा था कि भारतमें अछूतोद्धारके पर्याप्त प्रचार हो जानेके बावजूद अन्त्यजोंका अपमान होता रहता है और लोगोंको लगता है कि इस विषयमें गांधीजी भी ढीले पड़ गये।
  2. "पत्थरपर पानी गिरायें तो भी वह सूखाका सूखा ही रहेगा।"