दिलाना चाहता हूँ; 'रसरी आवत जात तें, सिलपर परत निशान। इस पंक्तिमें पहली कहावतसे अधिक सत्य है। जब हिमालयका पानी पत्थरोंसे टकराता हुआ नीचे आता है तो वे पत्थर सूखे बने रहना तो दूर, चूर-चूर हो जाते हैं प्रेमरूपी पानी से तो पाषाण हृदय भी पिघल जाता है।
नवजीवन, २४-३-१९२९
१६१. पत्र: छगनलाल जोशीको
[२४ मार्च, १९२९][१]
स्टीमरमें लिखे पत्र कल डाकमें छोड़ दिये गये थे, वे मिल गये होंगे। कलकत्ता पहुँचकर तुम्हारी डाक मिल गई। तुम्हारा वाडजमें आग बुझाने पहुँच जाना ठीक हो था। हम बीमा न करायें, किन्तु आग बुझानेके साधन अवश्य रखें और हर मास उनके उपयोगका अभ्यास भी करें यह हमारे लिए उपयोगी होगा। मकानमें सामान भी इस तरीकेसे रखें कि आगका भय कम रहे। बच्चोंको भी इस सम्बन्धमें उनकी जिम्मेदारीका भान कराते रहें। नियम तो यह है: हम बाह्य साधनोंसे अपनी जितनी रक्षा करते हैं उतने अंशतक आत्माका हनन होता है और वह निर्बल बनती है।
भैंसका घी रसोई-घरमें इस्तेमाल नहीं किया जाये। इस नियमका पालन सबको करना चाहिए।
खादी प्रतिष्ठानके सदस्योंके सूतके विषयमें बात करूँगा। बंगालसे सीखनेवाले व्यक्तियोंके आनेकी ज्यादा सम्भावना नहीं है। सन्देहशीलताके बारेमें[२] मुझसे अवकाश मिलनेपर पूछोगे तो मैं अच्छी तरह समझा दूंगा।
बम्बईमें जो खादी पड़ी है वह तथा उसके अतिरिक्त और खादी भी कलकत्ता भेज सकते हो। खादी पुरानी या गली हुई नहीं होनी चाहिए। यहाँके भण्डारमें आजकल खादी कम है। कपड़ेकी होलीके बाद यहाँ खादीकी माँग बहुत बढ़ गई है।
रोहड़ीसे बिचलदास आया है; क्या वह कोई पत्र नहीं लाया? उससे दर्जीका पूरा-पूरा काम लेना और उसे अच्छी तरह सिखा भी देना। यह भी देखना कि वह सभी नियमोंका पालन करता है या नहीं। उसका मलकानीके साथ परिचय कराना चलालाकी जमीनके बारेमें मुझसे पूछना।
आश्रममें कोई मौत हो जाये तो संयुक्त रसोई घर बन्द न हो; भोजन न बनाना हो तो न बनायें। हमारे पास खानेकी ऐसी चीजें तो हमेशा होती ही हैं