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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/२१९

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पत्र: मीराबहनको

जिससे जो खाना चाहें उनका काम चल सकता है। इस विषयमें और बात करना चाहो तो करना। मुझे तो भोजन बनानेमें भी कोई दोष नहीं दिखाई देता। मृत्यु कोई शोकका प्रसंग नहीं है। शोक दिखानेके लिए कुछ भी बन्द करनेकी जरूरत नहीं है। किन्तु अग्निदाह आदि क्रियाओंमें शामिल होनेके बाद कई लोग भोजन नहीं कर पाते। कई लोगोंको शोक न करना चाहते हुए भी अपने सम्बन्धके कारण शोक होता है। इसी विचारसे मैंने रसोई बन्द रखनेका सुझाव दिया है। रसोईका काम चलते हुए अगर किसी की मृत्यु हो जाये तो रसोई बन्द न की जाये। सूतक जैसा रिवाज तो अपने यहाँ है ही नहीं।

दक्षिण-संकट निवारणका पैसा राजाजीको भेज देना।

मारी गई बकरीके चमड़ेका उपयोग अनिवार्य मानता हूँ। लेकिन यह कमसे कम किया जाना चाहिए। जहाँ गायके चमड़ेसे काम चले वहाँ उसीका उपयोग करना ठीक होगा। हमने अभी तो अपने धर्मकी मर्यादा गाय-भैंस तक ही सीमित रखी है।

मीराबहनका एक पत्र इसके साथ भेज रहा हूँ उसमें योगेन्द्रसे[] सम्बन्धित भाग समझने लायक है। इस विषय में उसने तुम्हें लिखा तो है ही। किन्तु उसके बारेमें तुम और भी जान लो ताकि उसके वहाँ पहुँचनेपर सुविधा रहे राजेन्द्र बाबू यहीं हैं। उन्होंने उन दम्पतीको भेजनेको कहा है। उन्हें अपने कामके लिए तैयार कर लेना चाहिए। मीराबहनका काम आश्चर्यचकित कर देनेवाला जान पड़ता है। राजेन्द्र बाबू देख आये हैं और उससे बहुत प्रसन्न हैं।

बापूके आशीर्वाद

गुजराती (जी० एन० ५४९८) की फोटो-नकलसे।

१६२. पत्र : मीराबहनको

२५ मार्च, १९२९

चि० मीरा,

स्टीमरपर तुम्हें लिखा एक पत्र[] कल मैंने डाकमें डाला था। यहाँ पहुँचने पर तुम्हारे तीन पत्र मुझे मिले। आज तुम्हारा एक पत्र मुझे मिलना चाहिए पर ४ बजे शामतक तो कोई पत्र मिला नहीं। लगता है कि मेरे कल यहाँसे रवाना हो सकनेमें कोई कठिनाई नहीं होगी।

राजेन्द्रबाबू यहीं हैं। तुम जो कुछ कर रही हो उसके बारेमें उन्होंने मुझे सब कुछ बताया है दूसरोंसे अब तुम्हारे बारेमें जाननेको कुछ नहीं बचा है।

  1. एक आश्रमवासी।
  2. अनुमानतः यह पत्र २३ मार्चको कलकत्तामें छोड़ा गया था; देखिए “पत्र: मीराबहनको", २३-३-१९२९