सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/२२२

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
१९२
सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

मतभेद जाहिर करने तथा उनके नोटिसोंके विरुद्ध आचरण करनेके लिए विवश होना पड़ा था। लेकिन वहाँ उन्होंने विवादग्रस्त मुद्दोंको पहले अदालतमें परखनेकी सभ्य पद्धतिको स्वीकार किया है। वहाँकी पुलिस किसी मामलेपर कोई पूर्व निर्णय नहीं लेती और कानूनको स्वयं तोड़ने की जोखिम नहीं उठाती, और इससे भी बड़ी चीज यह है कि वहाँ पुलिस सार्वजनिक शान्ति भंग होनेका मौका अपनी तरफसे नहीं उठने देती।

मेरा दृढ़ मत है कि भीड़ पूरी तरह शान्त और अनुशासित थी। जो मामूली-सी आग वहाँ जलाई गई थी उससे आस-पासकी सम्पत्तिको कोई खतरा नहीं था। जलानेके लिए जो जगह चुनी गई थी वह सुरक्षित तथा अलग थी। इसलिए पुलिसका यह कर्त्तव्य था कि शान्तिपूर्ण तथा संयमित रूपसे हो रहे इस प्रदर्शनमें वह हस्तक्षेप न करती। मेरी राय में तो पुलिसका यह हस्तक्षेप निहायत अविचारपूर्ण, मनमाना और अनावश्यक था। आगको बुझाकर उन्होंने अदालतके कामको अपने हाथ में ले लिया और ऐसा मान लिया कि अदालतका भी यही फैसला होगा। इन मामलों के मुतल्लिक जो बयान मैंने दिया है यदि आप उसपर विश्वास करें तो, महानुभाव, मैं आपसे निवेदन करूँगा कि मुझे तथा मेरे साथियोंको रिहा कर दें, और पुलिसके दुर्व्यवहार पर आप जैसी कार्रवाई करना चाहें वैसी करें। और जिस धाराके अन्तर्गत मुझपर अभियोग लगाया गया है, अदालत उसकी जो भी व्याख्या करना चाहे, करे; मैं रिहाईकी माँग फिर भी करता हूँ।

दो शब्द धाराकी व्याख्याके बारेमें। जिन वकील दोस्तोंका उल्लेख श्रद्धानन्द पार्कमें हुए मेरे भाषणमें हुआ है उनमें से एक श्रीयुत सेनगुप्त भी थे। उनसे हुई एक दूसरी बहससे मेरे दिमागमें यह बात साफ हो गई कि इस धाराके अनुसार श्रद्धानन्द पार्क न तो कोई गली है और न कोई आम रास्ता ही। चूँकि विदेशी वस्त्र-बहिष्कार-समितिका इरादा, जहाँतक सम्भव है, इस आन्दोलनके सिलसिलेमें सविनय अवज्ञा करनेका नहीं है, अतः इस धाराकी प्रामाणिक व्याख्या हो जाना जरूरी है। लेकिन मैं किसी कानूनी मसलेपर बहस नहीं करूँगा।

मेरे जिन तीन साथियोंको मुख्य अपराधी कहा गया है, उनके बारेमें मैं यह कहना चाहूँगा कि वस्त्र जलानेकी क्रिया तो वास्तवमें मैंने प्रारम्भ की थी। इसलिए अगर हममें से किसीने कोई अपराध किया है तो उसमें मुख्य अपराधी मैं ही हूँ,बाकी ये तीन तो गौण अपराधी हैं।[]

[अंग्रेजीसे]
फॉरवर्ड, २७-३-१९२९
  1. फैसला दूसरे दिनके लिए रोक लिया गया था। अदालतके फैसलेके सम्बन्धमें गांधीजीके विचारों के लिए देखिए "वह परीक्षात्मक मुकदमा", ४-४-१९२९।