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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/२२६

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

उसकी बुद्धिमत्तापर विश्वास नहीं रह जाता। जिस तरह नदीको पैदल पार करने-वाले आदमीको उसकी कमसे-कम और ज्यादासे-ज्यादा गहराई अच्छी तरह जान लेनी चाहिए उसी तरह आंकड़ोंका सही उपयोग करनेकी इच्छा रखनेवाले आदमीको आँकड़ोंके इस सार-संक्षेपकी तहमें जो वास्तविक आँकड़े होते हैं उन्हें और उनके उपयोगके तरीकेको जान लेना चाहिए। लेकिन सामान्य आदमीके पास न तो इतना समय होता है और न इतनी योग्यता ही होती है कि वह आँकड़ोंके गोरखधन्धेका अध्ययन कर सके। उसके लिए तो देशकी हालतको जाँचनेकी सच्ची कसौटी गाँवोंका आँखों-देखा अनुभव है। इस तरहके अनुभवको आँकड़ोंकी कोई भी करामात झूठा नहीं साबित कर सकती।

भारतका आँखों-देखा तजुर्बा रखनेवालोंने, जिनमें ऐसे कई अंग्रेज अधिकारी भी शामिल हैं, जिनका स्वार्थ ही इस बातमें है कि वे कोई विरोधी बात ढूंढ़ पायें तो अच्छा, इस बातको कबूल किया है कि ब्रिटिश शासनमें भारत दिन-दिन गरीब होता जा रहा है। आप देहात में जाकर जरा देखिए, गाँववालोंके चेहरोंपर निराशा और दुखकी छाया ही आपको नजर आयेगी। वे और उनके मवेशी, दोनों पूरा भोजन नहीं पाते। मृत्युसंख्या सपाटेसे बढ़ रही है। उनके शरीरमें रोगसे लड़नेकी ताकत नहीं है। यह तो जानी हुई बात है कि मलेरिया कोई खतरनाक बीमारी नहीं है, बशर्ते कि मरीजको कुनैन और शुद्ध दूध पीनेको मिलता रहे। फिर भी हर साल हजारों देहाती मलेरियाकी भेंट होते रहते हैं। कुनैन उनको भले ही दे दी जाती हो, लेकिन बीमारीकी कमजोरीसे छुटकारा पानेके लिए उन्हें दूध कहीं भी नहीं मिल सकता। उनकी कर्जदारी बराबर बढ़ रही है। यह कहना सत्यका जघन्य अपलाप है कि व्याह वगैरामें फिजूलखर्चीके कारण वे कर्जदार होते जा रहे हैं। ये कोई नये खर्च नहीं हैं जो कोई आज नये सिरेसे उनकी गरीबीको बढ़ा रहे हों। धन जमा करने और चाँदीके सिक्कोंके गहने बना लेनेकी कथाएँ तो कोरी कल्पनाएँ हैं करोड़ों लोगोंके पास सोने-चांँदीके गहने न कभी थे और न आज ही हैं। स्त्रियाँ लकड़ी और यहाँ-तक कि पत्थरकी भोंडी चूड़ियाँ और अंगूठियाँ पहनती हैं और इन्हें पहननेसे उनको स्वच्छंद अंग-संचालनमें बाधा पड़ती है, यही नहीं उनकी तन्दुरुस्तीको भी नुकसान पहुँचता है। गाँववालोंमें निरक्षरता तो बढ़ती ही जा रही है। ये सब चीजें देशकी बढ़ती हुई समृद्धिके लक्षण कदापि नहीं हैं।

आइए, अब हम देशके आयात-निर्यातकी हालतपर थोड़ा विचार करें। १९२७-२८ में देशसे ३०९ करोड़ रुपयोंका माल बाहर भेजा गया और २३१ करोड़से अधिक रुपयेका माल विदेशोंसे देशमें आया। जो चीजें बाहर भेजी गई उनमें कच्चा माल, जैसे, कपास, अनाज, तिल, मूंगफली वगैरा, कच्चा और कमाया हुआ चमड़ा, कच्ची और पक्की धातुएँ आदि मुख्य हैं। अगर हमारे‌ पास इस कच्चे मालका उपयोग करनेके लिए आवश्यक हुनर होता और लगानेको पर्याप्त पूँजी होती अथवा हमारी अपनी एक सरकार होती जो इस तरहका हुनर और पूंजी हमारे लिए उपलब्ध करना अपना कर्त्तव्य समझती, तो यह कच्चा माल भारतमें ही रहता। भारतके निर्यातकी