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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/२२७

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विधान-सभाओंमें खादी

कथा हमारी बेबसीकी कथा है और वह बतलाती है कि सरकार लोकहितके प्रति कैसी घोर उदासीनता बरतती है।

जो चीजें विदेशोंसे भारत में आती हैं उनमें ६५ करोड़का सूती कपड़ा, ४ करोड़का नकली रेशम, १८ करोड़की शक्कर, २३ करोड़की धातु और धातुसे निर्मित वस्तुएँ, ५ करोड़की मोटर गाड़ियाँ, ३ करोड़की शराब और लगभग २ करोड़की सिगरेटें शामिल हैं। इन वस्तुओंका आयात भी हमारी बेबसीकी उसी दर्दनाक कथाको दोहराता है। स्वस्थ रूपसे प्रगति कर रहे किसी देशमें ऐसी ही वस्तुओंका आयात होना चाहिए जिसकी देशको अपनी अभिवृद्धिके लिए आवश्यकता हो। विदेशोंसे आने-वाली जिन चीजोंके नाम मैं ऊपर गिना गया हूँ वे हमारी उन्नतिके लिए आवश्यक नहीं हैं। शराब और सिगरेट हमारे पतनमें सहायक होती हैं। सूती कपड़ेका सबसे अधिक आयात किया जाता है और इससे हमारी शर्म और हमारी फटेहालीका पर्दा-फाश हो जाता है। इनसे हम समझ सकते हैं कि जब भारतमें लोग घर-घर अपने हाथों कपड़ा बनाया करते थे उस समय हमारे देहातोंकी दशा कितनी अच्छी रही होगी किसानों को उनके बेकारीके दिनोंमें काम देनेवाला सिवा चरखेके और कौन-सा साधन है? ये देहाती लोग कमजोर विदेशी कपड़ेपर जो करोड़ों रुपये खर्च करते हैं उसको देशसे बाहर जानेसे रोकनेका और कौन-सा जरिया है? जो लोग इस तरह अपना धन विदेशों में भेज रहे हैं, उनका दिन-दिन गरीब और असहाय होना एक निश्चित बात है।

[अंग्रेजीसे]
यंग इंडिया, २८-३-१९२९

१६९. विधान-सभाओंमें खादी

विदेशी वस्त्र-बहिष्कार योजनाकी उस धाराको प्रभावशाली बनानेके लिए, जो विधानसभाओं द्वारा खादीको रक्षा करने तथा उसे लोकप्रिय बनानेकी अपेक्षा रखती है, श्री राजगोपालाचारी किसी युक्तिकी खोजमें लगे हुए हैं और इस काममें वे अपनी कानूनी प्रवीणताकी मदद ले रहे हैं इसीलिए उन्होंने विधेयकका नीचे लिखा मसविदा कांग्रेसाध्यक्षको विचारणार्थं भेजा है:

चूंँकि 'खद्दर' और 'खादी' का तात्पर्य उस सूती कपड़ेसे है जो भारतमें हाथसे काता और बुना जाता है;

और चूंकि इन कथित नामोंको बनाये रखना वांछनीय है; इसलिए निम्नलिखित कानून बनाया जाता है:

१. इस अधिनियमको भारतीय खद्दर (नाम सुरक्षा) अधिनियम १९२९ कहा जाये।

२. इस अधिनियमके अनुसार 'खद्दर' और 'खादी' का अर्थ सूतके उस कपड़ेसे है जो भारतमें हाथसे काता और बुना गया हो।