लिए मैं उनकी विनतो नहीं करता। रियासतोंकी बात दूसरी है। यह स्थिति देखते हुए जो मर्यादा हमने बाँधी है उसमें कोई मानहानि नहीं है। वह एक सुन्दर वृक्ष है, उसमें से सुन्दर फल निकलेगा। इससे राजाओंकी सेवा होगी क्योंकि वे तो पराधीन हैं। उनकी पराधीन अवस्थाको पहचानकर हम अपनी मर्यादाकी रक्षा करें और उन्हें कठिन स्थितिमें न डालें। हमारे आजके प्रस्ताव दोनों दलोंके हित में होने चाहिए। यदि ये प्रस्ताव राजा-प्रजा दोनोंके हितकी रक्षा करनेवाले हों तभी हम शान्तिसे अपना काम कर सकेंगे। यदि आपका मन पोरबन्दरके बाद डाँवाडोल हो गया हो तो मैं यही कहूँगा कि आप शान्त रहें । मर्यादाका पालन करते हुए आप खूब काम कर सकेंगे, ऐसा मैं मानता हूँ।...
आप लोगोंने कितना काता है, चरखेका कितना प्रचार किया है, कितनी खादी उपयोगमें लाये है अमरेलीकी खादोके लिए मुझे कलकत्तेमें ग्राहक ढूंढ़ने पड़े, यह कितनी शर्म की बात है। आप २५ लाख किसानोंके प्रतिनिधि बनकर यहाँ आये हैं, तो प्रतिनिधिके रूप में आपने क्या किया है? यदि आप सचमुच कुछ करना चाहते हैं तो रचनात्मक काम करके ही आपका छुटकारा हो सकता है, नहीं तो आपको परिषदका रूप ही बदलना पड़ेगा। राजनीतिक परिषद जैसी परिषदमें तो हमें सत्यसे काम लेना चाहिए; इसके बदले हम कृत्रिमता और असत्यसे काम लें तो कितने खेदकी बात है। अन्त्यजोंके लिए मूलचन्दको सिर्फ मुट्ठीभर पैसा चाहिए। यदि उसके लिए भी उसे मेरे पास आना पड़ेगा तो कितने शर्मंकी बात है। दो-चार हजार रुपये कोई बड़ी रकम नहीं है। मैं कुछ कहूँ या सरदार माँग करें तो यह सारी रकम आ जानी चाहिए। यह काम करनेके लिए चरित्रवान नवयुवकोंकी आवश्यकता है। यदि आप यह और दूसरे ऐसे काम करेंगे तो आपकी राजनैतिक शक्ति बढ़ेगी। हम राजनीतिक काम न करें तो परिषदको राजनीतिक परिषदके नामसे क्यों बुलायें? चरखा परिषद या लोक-सुधार परिषद आदि कोई गुणवाचक नामसे बुलायें। आप कोई भी काम क्यों न करें, २५ लाख किसानोंपर तो आपको विजय प्राप्त करनी ही है; यह उन्हें प्रेमकी डोरीसे बाँध कर ही सम्भव है। वल्लभभाईने क्या किया? ब्रिटिश सल्तनतके समूचे इतिहासमें जब उसका जोर सबसे ज्यादा था तब एक व्यक्तिने सरकारसे एक करोड़ व्यक्ति अपने हाथमें कर लिये और उनकी व्यवस्था भी खुद सँभाली। बारडोली में गवर्नरने जोरदार धमकियाँ दीं, परन्तु वल्लभ-भाई अपनी बात पूरी करके ही रहे वल्लभभाई भी तो हमारे-तुम्हारे जैसा मनुष्य ही है; लेकिन वह किसान बना, बारडोलीके सुख-दुखका भागी बना, उनके इशारों पर चला। इसलिए किसान आज वल्लभभाईके इशारेपर चलते हैं। फिर भी हम यह न भूलें कि बारडोलीकी चाभी चरखा ही था। सभी प्रकारको राजनैतिक चर्चा कर ली और काम हो गया, ऐसा नहीं है। आप यह मिथ्या विचार भी मनसे निकाल दें कि राजाओंके दोषोंका बखान करनेसे काम चल जायेगा। दक्षिण आफ्रिकामें मैंने राजनीतिकी बात नहीं की। चम्पारनमें कांग्रेसका नाम भी नहीं लिया; किन्तु आज वहाँ कांग्रेसका सबसे ज्यादा काम हो रहा है। हम बड़े-बड़े भाषणोंसे शासकोंको डराना चाहें तो बात नहीं बनेगी। उससे तो बच्चोंका मनोरंजन भी नहीं होगा। अव्यवस्था