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करनेके लिए कमाता है वह काम करते हुए भी अकर्मा है; वह हिंसा करते हुए भी अहिंसक है। क्रियाहीन अहिंसा आकाश-कुसुमके समान असम्भव है। क्रिया हाथ-पैरसे हो होती हो, सो नहीं। मन हाथ-पैरकी अपेक्षा बहुत ज्यादा काम करता है। विचार-मात्र क्रिया है। विचार-रहित अहिंसा हो ही नहीं सकती। शरीरधारी मनुष्यके लिए ही अहिंसा धर्मकी कल्पना [आदर्शके रूपमें] की गई है।
सर्वभक्षी जब दयासे प्रेरित हो कर भक्ष्य पदार्थोंकी मर्यादा निश्चित करता है तब उस हदतक वह अहिंसा धर्मका पालन करता है। इसके विपरीत, जो रूढ़िके कारण मांसादि नहीं खाता, वह अच्छा तो करता है, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि उसमें अहिंसाका भाव है ही। जहाँ अहिंसा है वहाँ ज्ञानपूर्वक दया होनी ही चाहिए।
अगर अहिंसा धर्म सच्चा धर्म हो तो हर तरह व्यवहारमें उसके आचरणका आग्रह करना भूल नहीं, बल्कि कर्तव्य है। व्यवहार और धर्मके बीच विरोध नहीं होना चाहिए। धर्म-विरोधी व्यवहार छोड़ देने योग्य है। सब समय सब जगह, सम्पूर्ण अहिंसा सम्भव नहीं है, यों कह कर अहिंसाको एक ओर रख देना हिंसा है, मोह है और अज्ञान है। सच्चा पुरुषार्थं तो इसमें है कि हम अपने आचरण में सदा अहिंसाका पालन करें। इस तरह आचरण करनेवाला मनुष्य अन्तमें परमपद प्राप्त करेगा, क्योंकि वह सम्पूर्णतया अहिंसाका पालन करने योग्य बनेगा। और यों तो देहधारीके लिए सम्पूर्ण अहिंसा बीज-रूप ही रहेगी। देहधारणके मूलमें हिंसा है, इसी कारण देहवारीके पालने योग्य धर्मका सूचक शब्द निषेधवाचक अहिंसाके रूपमें प्रकट हुआ है।
नवजीवन, ३१-३-१९२९
१७५. बर्मावासी गुजरातियोंके नाम
जहाँ जाता हूँ वहाँ ऐसा प्रेम मिलता है कि उसका वर्णन नहीं कर सकता। लोगोंकी अपार भीड़, वैसा ही उत्साह, वैसी ही पैसोंकी वर्षा इसलिए ईश्वरपर मेरा विश्वास बढ़ता जाये, चरखेकी शक्ति मुझे ज्यादा दिखाई दे, तो इसमें विचित्र क्या है? यदि लोगोंके मनमें मेरी किसी दूसरी शक्तिके प्रति श्रद्धा हो तो वे मुझे चरखेके लिए धन क्यों दें? यदि मैं लोगोंसे चरखा बनानेके बजाय छुरी बनानेके लिए भिक्षा माँगूँ तो वे मुझे कभी दान न दें।
मेरा बर्मामें एक मास रहनेका विचार था। किन्तु इस वर्ष मैं इस तरह व्यस्त रहा हूँ कि जितना समय दिया उससे ज्यादा देना सम्भव ही नहीं था। इसलिए कई स्थानोंपर नहीं जा सका, हजारों लोगोंको निराश करना पड़ा और उसी अनुपातसे दरिद्रनारायणकी झोली खाली रही।