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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/२३७

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१७६. तार: माधवजी ठक्करको

मोरवी
[१ अप्रैल, १९२९][]

इम्पॉर्टन्स
कलकत्ता
उपवास कैसा चल रहा है, इसकी खबर तारसे साबरमतीके पतेपर दीजिए।

गांधी

अंग्रेजी (जी० एन० ६७६३)को फोटो-नकलसे।

१७७. पत्र: मीराबहनको

मोरवी
१ अप्रैल, १९२९

चि० मीरा,

तुम्हारे सभी पत्र मुझे मिल गये हैं ताज्जुब है कि २७ तारीखतक भी तुम्हें मेरा तार []नहीं मिला। इसे मुकदमेके तुरन्त बाद ही भेज दिया गया था। मोरवीके बारेमें तो तुम जानती ही हो। हर एक जानना चाहता था कि तुम कहाँ हो।

हम यहाँसे आज रात रवाना होंगे।

तुम्हें यह जानकर दुख होगा कि छगनलाल गांधीकी यह पोल खुली है कि वह पिछले कई वर्षोंसे छोटी-छोटी चोरियोंका बाकायदा धन्धा चला रहा था। अपना भेद खुलनेपर उसने जालसाजी करके अपना अपराध छिपाने की कोशिश की थी। लेकिन अब उसने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है। लेकिन अपराध स्वीकार करनेसे वह बदल नहीं गया है आश्रममें उसको अपना जीवन भार हो गया था और दो दिन हुए वह राजकोट चला गया। वहाँ भी उसे शान्ति मिलनेकी बहुत कम सम्भावना है। यह जानकारी मेरे जीवनकी शायद सबसे बुरी घटना है। फिर भी इससे मैं विचलित नहीं हुआ हूँ। मैंने अपने ऊपर कोई प्रायश्चित्त भी नहीं थोपा है। और सारी बस्तीको इस दुखद घटनाकी सूचना देनेके अलावा मैंने इस बुरे कार्यके बारेमें और कुछ नहीं किया है। मैंने उसे यह सलाह बेशक दी है कि उसका यह कर्त्तव्य है कि उसके पास जो कुछ भी है उसे वह वापस कर दे।

  1. डाककी मुहरसे।
  2. देखिए "तार: मीरावद्दनको", २६-३-१९२९।