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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/२३८

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

मुझे खुशी है कि तुम इमारतको बढ़वा रही हो। यदि तुम्हारे पास रहने-वालोंकी तादाद ज्यादा हो, तो फिर अधिक स्थानका बन्दोबस्त तो तुम्हें करना ही पड़ेगा। जब हाजमा जरा-सा भी खराब हो, भोजन छोड़ दो। कमजोरीकी परवाह मत करो। जब तुम खाना खाने लगोगी, तब ताकत तो आ ही जायेगी। लेकिन शरीर जब पचा न सके तब स्वयं भोजन कमजोरी पैदा करेगा।

सप्रेम,

बापू

अंग्रेजी (जी० एन० ९४१२)से; तथा सी० डब्ल्यू० ५३५६ से भी।
सौजन्य: मीराबहन

१७८. तार: माधवजी ठक्करको

सबरमती
२ अप्रैल, १९२९ इम्पॉर्टेन्स
कलकत्ता

सुधारकी खबर सुनकर खुशी हुई। नहानेमें साबुनका इस्तेमाल मत करो।

गांधी

अंग्रेजी (जी० एन० ६७६५०)की फोटो-नकलसे।

१७९. पत्र: माधवजी ठक्करको

२ अप्रैल, १९२९

भाईश्री माधबजी,

तुम्हारा पत्र मिल गया है। आज ही तार भेजा है। उसका जवाब कल साबरमती मिलेगा। लगता है कि सब काम ठीक चल रहा है। एक परिवर्तन कर लो। शरीरपर साबुन लगाने की कोई जरूरत नहीं है। पानीमें रूमाल गीला कर उससे शरीर रगड़ना ही काफी होगा। साबुन शरीरके लिए हानिकारक है और उससे त्वचा की उपयोगी चर्बी चली जाती है। शरीरको अच्छी तरह पोंछ लेनेसे वह बिल्कुल साफ हो जाता है। बाहरसे शरीरपर लग जानेवाला मैल दूर करनेके लिए कभी-कभी साबुन उपयोगी होता है। पसीनेसे उत्पन्न मैलका उससे साफ किया जाना जरूरी नहीं है।

मोहनदासके वन्देमातरम्

गुजराती (जी० एन० ६७६४ )की फोटो-नकलसे।