१८२. वह परीक्षात्मक मुकदमा
कपड़ोंकी होलीके मामलेमें आखिर कलकत्ताकी पुलिसकी, दूसरे शब्दोंमें, बंगाल सरकारकी पूरी-पूरी जीत हुई है इस मामलेके सिलसिले में मैंने जो कुछ किया है, कोई भी उसकी नकल न करे, उसे आदर्श न माने। मनुष्यके जीवनमें ऐसी कई बातें होती हैं जिन्हें वह चाहता है कि लोग उनका अनुकरण करें, दूसरी कई बातें ऐसी भी होती हैं जो वस्तुतः बुरी न होते हुए भी न तो अनुकरणीय होती हैं और न उनका अनुकरण किया ही जाना चाहिए। अतः मुझे यह देखकर खुशी हुई थी कि कई मित्रोंको इस बातसे उलझन हुई और दुःख भी हुआ कि मैंने व्यक्तिगत जमानत देकर भी नजरबन्दीसे अपनेको छुड़ा लिया, मुकदमे में अपना बचाव पेश किया और इससे भी ज्यादा यह कि मैंने अपने बचावके लिए वकील खड़ा किया। उन्होंने जोरदार शब्दों में मुझसे पूछा कि मैं एक पक्के असहयोगीको हैसियतसे ये तीनों काम किस तरह कर सकता हूँ और इस तरह जिन बातोंका मैं अबतक उपदेश देता रहा उनके खिलाफ कैसे जा सकता हूँ।
मनुष्य दो तरह से अपनी बातपर दृढ़ रह सकता है: बुद्धिपूर्वक और अबुद्धि-पूर्वक। जो आदमी भारतको गर्मी में नंगे बदन रहता है वह अपनी बातपर कायम रहनेकी गरज से अगर नार्वेकी सर्दीमें भी नंगे बदन रहेगा तो मूर्ख समझा जायेगा और ऊपरसे अपनी जान गंवा बैठेगा।
जो काम मैं व्यक्तिगत हैसियतसे नहीं कर सकता, एक प्रतिनिधिके तौर पर वही मेरे लिए अनिवार्य हो जाता है। एक ओर अखिल भारतीय चरखा संघके ट्रस्टीके नाते मेरे पास लाखों रुपये हैं, लेकिन दूसरी ओर व्यक्तिगत रूपमें एक दमड़ी भी मेरे पास नहीं है। उस संघके ट्रस्टीके नाते अनिवार्य होनेपर मैं मुकदमा दायर करनेका अधिकार देता हूँ, मुकदमा दायर करनेका आदेश भी देता हूँ। अपनी व्यक्तिगत हैसियतमें मैं ऐसी किसी आवश्यकताको कल्पना नहीं कर सकता। कपड़ेकी होलीके मामलेमें विदेशी वस्त्र वहिष्कार समिति के अध्यक्षके नाते मेरी हैसियत एक ट्रस्टीकी थी। अगर मुझे ऐसा लगा होता कि होलीको रोकनेके सम्बन्धमें पुलिसका नोटिस कानून-सम्मत है, तो मैं श्रद्धानन्द पार्ककी होलीको रोकनेकी सलाह देता कारण, मैं उस समय सविनय अवज्ञाकी सलाह देनेके लिए तैयार नहीं था। लेकिन मुझे लगा कि जिस धाराके अधीन नोटिस दिया गया था उसके दो अर्थ किये जा सकते थे। अतः परीक्षण के लिए यह एक योग्य विषय बन गया। इस सिलसिलेमें आगे जो कार्रवाई हुई वह परिस्थिति के अनुसार स्वाभाविक थी। अगर होलीको रोकनेके सम्बन्धमें पुलिसके अधिकारकी जाँच जरूरी थी तो मामलेकी सफाई देनी चाहिए थी और अगर सफाई देनी जरूरी थी तो मुझे विनम्र भावसे किसी वकील द्वारा अपनी सफाई पेश करानी चाहिए थी क्योंकि बहुत समयसे छोड़ी हुई अपनी वकालतकी योग्यताके आधारपर कानूनके शास्त्रीय मुद्दोंपर बहस करना दम्भपूर्ण कार्य