होता। और मेरा व्यक्तिगत जमानत न देना सार्वजनिक जीवनमें अपने स्थानकी मर्यादाओंका उल्लंघन करना होता। अगर मैं जमानतके पत्रकपर दस्तखत न करता तो भी मेरे विचारमें पुलिस कमिश्नरने मुझे बर्मा जानेकी इजाजत दे दी होती। किन्तु यदि मैं दस्तखत न करता तो लोगोंमें एक शिष्ट और सज्जन पुरुषके रूपमें मेरी जो ख्याति है उसे मैं खो बैठता।
लेकिन असहयोगियोंके सामने ऐसे मामले बार-बार पेश नहीं होते। वे ऐसे जिम्मेदारी के काम हाथमें लेंगे ही नहीं, या लेनेसे बचेंगे, जिनमें व्यक्तिगत आचार और सार्वजनिक उत्तरदायित्वके बीच संघर्षकी सम्भावना हो। इसी कारण मैं जनताको इस मामलेमें मेरी नकल न करनेके लिए सचेत कर चुका हूँ। साधारण तौरपर कसौटी तो यही है कि असहयोगीको अपने लाभ या आरामके लिए न तो जमानतका सहारा लेना चाहिए और न अपना बचाव पेश करनेका।
कलकत्तेके मामलेका जो परिणाम प्राप्त हुआ है वह निराशाजनक है और उससे ब्रिटिश अदालतोंके सम्बन्धमें मेरी धारणाकी पुष्टि होती है। अदालतने पुलिसके व्यवहारको जिस ढंगसे उचित साबित किया है, मुझे उसकी आशा नहीं थी। अदालतका कर्त्तव्य तो यह था कि वह पुलिसके कार्यकी निन्दा करती, क्योंकि मेरे इस अत्यन्त स्पष्ट वक्तव्यके बावजूद उसने होलीके काममें रुकावट पेश की थी कि मैं सविनय अवज्ञा करनेके लिए यह काम नहीं कर रहा हूँ, बल्कि मेरा पक्का विश्वास है कि प्रस्तुत धारा श्रद्धानन्द पार्क जैसे स्थानोंपर लागू नहीं होती। लेकिन वस्तुस्थिति तो यह है कि कलकत्ताकी पुलिसको उसकी हुल्लड़बाजीके लिए शाबाशी और सदाचारका प्रमाणपत्र मिला है।
अदालतके इस निर्णयसे मेरा यह विचार और भी दृढ़ हो गया है कि अधि-कारियों और जनतामें गम्भीर विरोधकी स्थितिमें न्यायाधीश, अनजाने ही क्यों न हो, अधिकारियोंको ही दोषमुक्त ठहराते हैं।
लेकिन यह अच्छा हुआ कि यह मामला परीक्षात्मक मुकदमेके रूपमें लड़ा गया था। अन्यथा श्रद्धानन्द पार्कमें जो विशाल प्रदर्शन हुआ उसका होना असम्भव था। पुलिसके उद्दण्डतापूर्ण कार्यके चलते वहिष्कार आन्दोलनका जैसा प्रचार हुआ और उसे जो प्रोत्साहन मिला, वह अन्यथा शायद ही कभी मिलता। अतः पुलिसको सदाचारका जो प्रमाणपत्र मिला है, वह स्वागतकी चीज है।
यंग इंडिया, ४-४-१९२९