दिन-दहाड़े डाका
पण्डित सुन्दरलालकी विद्वत्तापूर्ण हिन्दी पुस्तकके दोनों खण्डोंकी बिना मामला चलाये, बिना परीक्षा किये और ग्रन्थकर्त्ताको किसी भी रूप में अपना बचाव प्रस्तुत करनेका अवसर न देते हुए, जो जब्ती की गई है, वह संयुक्त प्रान्तकी सरकार द्वारा दिन-दहाड़े डाका डालनेसे किसी कदर कम नहीं है। ये पुस्तकें वर्षोंको मेहनतका नतीजा हैं। इनके प्रकाशन में भी बहुत ज्यादा रुपया खर्च हुआ है और अगर जब्तीका हुक्म कायम रखा गया तो उससे ग्रन्थकर्त्ता या प्रकाशकका, जिस किसीने भी इनपर इतना धन खर्च किया हो, सर्वनाश ही हुआ समझ लेना चाहिए। प्रकाशकने जो वक्तव्य स्पष्ट शब्दोंमें प्रकट किया है उससे पता चलता है कि सरकारको इन पुस्तकोंके बारेमें पहलेसे जानकारी थी उसे पता था कि पुस्तकके दोनों भाग शीघ्र ही प्रकाशित होनेवाले हैं और उसे यह भी मालूम था कि उनमें क्या होगा। तिसपर भी उसने बिना कोई चेतावनी दिये और बिना कोई समुचित जाँच किये इन पुस्तकोंको एकदम जब्त कर लिया। प्रकाशकके कथनानुसार संयुक्त प्रान्तकी सरकारको पुस्तककी परीक्षाके लिए दो दिनसे ज्यादाका समय नहीं मिल सकता था। ग्रन्थकर्त्ताको और जनताको यह जाननेका पूर्ण अधिकार था कि इन पुस्तकोंमें कौन-सी बातें आपत्तिजनक थीं। मैं यह बात अपने कड़वे अनुभवके आधारपर लिख रहा हूँ। आजतक मुझे मालूम नहीं हुआ है कि मेरी लिखी 'हिन्द स्वराज्य' नामक पुस्तक और रस्किन की 'अनटु दिस लास्ट' पर आधारित मेरी 'सर्वोदय' पुस्तक क्यों जब्त की गई थीं। मुझे उनकी जब्ती की कोई पूर्व सूचना नहीं दी गई थी। सिर्फ एक मित्रसे मुझे मालूम हुआ था कि ये पुस्तकें जब्त की गई थीं। लेकिन जनताको इस दिन-दहाड़ेकी लूटसे एक तरहका सन्तोष होना चाहिए। क्योंकि सरकार अपनी इन करतूतों से हमें सविनय अवज्ञाके ऐसे सरल साधन प्रदान कर रही है जिनका यदि आवश्यक हुआ तो अगले वर्ष बड़े पैमानेपर उपयोग किया जा सकेगा।
'नवाकाल' का मुकदमा
'नवाकाल' वाले श्री खाडिलकरके विरुद्ध जो मामला चलाया गया उसे मैंने मुकदमा कहा है। वस्तुतः यह मुकदमा नहीं, उत्पीड़न है। लेकिन जो सरकार जनताके विरोधके बावजूद चलायी जा रही है, और विशेष रूप से उस हालतमें जब, जैसा कि हमारे मामलेमें है, इस जन विरोधका दमन किया जाता है, उस सरकारके राज्यमें स्पष्टवक्ता पत्र-सम्पादकोंका उत्पीड़न एक निश्चित बात होनी चाहिए। श्री खाडिल-करकी नीति हमेशा अपनी बात बिना किसी लाग-लपेटके स्पष्टतापूर्वक कहनेकी रही है। और वे एक प्रभावशाली तथा जनप्रिय लेखक हैं। अपनी स्पष्टवादिताके कारण उन्हें जो लोकप्रियता मिली है उसका मूल्य उन्होंने चुकाया है। मैं उन्हें हार्दिक बधाई देता हूँ। मैं जानता हूँ कि श्री खाडिलकर एक तत्ववेत्ता हैं। एक दिन उन्होंने मुझसे कहा था कि एक पत्रकारकी हैसियतसे उन्हें समय-समयपर जोखिम भरे कार्योंके लिए जो जुर्माना देना पड़ा था, उसे उन्होंने अक्सर नाटक लिख-लिखकर चुकाया है। वह अपने पत्रको जुर्मानेके कारण होनेवाले कर्जसे बचाकर उसे चलाने और उसके