करते हुए उन्होंने कहा कि किसी राष्ट्रके लिए यह अपमानकी बात है कि उसके बच्चे उस पैसेपर शिक्षा ग्रहण करते हों जिसकी उगाही शराब जैसे साधनोंसे की गई है। उन्होंने कहा कि हैदराबादमें परिस्थितियाँ भिन्न हैं; आप लोगोंको चाहिए कि आप परम माननीय निजाम के पास प्रतिवेदन भेजें तथा इस दिशामें एक नया कदम उठाकर ब्रिटिश भारत के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत करें। गांधीजीने कहा, गोवधको समाप्त करने तथा इस प्रकार हिन्दू-मुस्लिम एकताको दिशामें एक बड़ा कदम उठानेके लिए मैं निजामको बधाई देता हूँ। अन्तमें उन्होंने दलित जातियोंके प्रश्नको चर्चा करते हुए कहा कि अस्पृश्यताके अभिशापका शास्त्रोंमें कहीं समर्थन नहीं किया गया है। हिन्दुओं को चाहिए कि वे समाजसे इस बुराई को दूर कर दें।
हिन्दू, ८-४-१९२९
१९०. पत्र : छगनलाल जोशीको
[७ अप्रैल, १९२९ से पूर्व][१]
तुम्हें छगनलाल गांधी के विषयमें लिखना भूल गया। उसने जो रुपया दिया है उसमें चोरीका धन भी है। यह शायद तुम्हें न मालूम हो। इसमें थोड़े गहनों और व्याजका पैसा है, जिसे लौटा देना मैं अधर्म मानता हूँ और हममेंसे किसीको उसे वापस करनेका अधिकार नहीं है। हमें मानना चाहिए कि यह पैसा इस्तेमाल किया जा चुका है। हमें ट्रस्टके रूपमें दान लेनेका अधिकार है। उसे वापस देनेके लिए हमारे पास कोई नैतिक या कानूनी कारण होना चाहिए। इस मामलेमें दोनोंमें एक भी कारण नहीं है। छगनलालको पेन्शन देनी हो तो दी जा सकती है। ऐसा करना हमारा कर्तव्य भी हो सकता है। छगनलाल क्या करना चाहता है, क्या करेगा, यह देखना बाकी है। मैंने उसे पिछले सप्ताह पत्र लिखा है।
वह जानता है कि हम उसे भूखों नहीं मरने देंगे। काशीकी जिम्मेदारी तो हमारे ऊपर है ही।
बापूके आशीर्वाद
इसके साथ सेठ गोविन्ददासका पत्र वापस भेज रहा हूँ। क्या इस समय वहँ किसी को भेज सकते हैं? और कोई न हो तो सोतलासहाय तो है ही। विचार करना। सूरजभानको इस विषयमें कितना अनुभव हो चुका है।
- ↑ छगनलाल गांधीकी भूलके उल्लेखसे। देखिए "पत्र: छगनलाल जोशीको", ५-४-१९२९-।