१९१. मेरा दु:ख, मेरी शर्म
इस अध्यायको लिखने या न लिखनेके सम्बन्धमें लगातार विचार करनेके बाद आखिर मैं इस नतीजेपर पहुँचा कि न लिखना अधर्म होगा। सत्याग्रह आश्रम यानी उद्योग मन्दिरको बहुत-से मित्र पवित्र स्थान समझते हैं। कई अपने प्रियजनोंको मौतके बाद उनकी पवित्र स्मृतिमें यहाँ खादी कार्यक्रमोंके लिए द्रव्य भेजते हैं। मैं उसे स्वीकार भी करता हूँ । फिर भी इस मन्दिरमें बड़े-बड़े पाप प्रकट हुए हैं। मन्दिरमें रहनेवालोंसे तो मैं इस बातकी चर्चा कर चुका हूँ, लेकिन इतना ही काफी नहीं है। 'नवजीवन' के पाठकोंके साथ मेरा सम्बन्ध धार्मिक है। इस सम्बन्धके पीछे मेरी और मुझसे सम्बन्ध रखनेवालोंकी पवित्रता निहित है। मैंने कई बार लिखा है कि पाप छुपाया नहीं जा सकता। मेरे पास तो छुपानेके लिए कुछ है ही नहीं। मन्दिरमें जो पाप प्रकट हुए हैं उनकी खबर उससे सम्बन्ध रखनेवालोंको दे देना उचित है और आवश्यक है। यही सोचकर पाठकोंके सामने उन्हें दीनतापूर्वक उपस्थित करता हूँ।
मेरे प्रिय भतीजे——स्वर्गीय मगनलाल गांधीके बड़े भाई——छगनलाल गांधीके विषयमें यह पता चला है कि वे वर्षों पहलेसे चोरी करते चले आ रहे हैं; उन्हें मैंने अपने पुत्रके समान पाला और बचपनसे अपने पास रखा है। अगर उन्होंने खुद चोरीको बात कबूल कर ली होती तो मुझे इतना दुःख न होता। लेकिन यह चोरी तो आश्रमके उनके हमनाम, जागृत मन्त्रीने[१] अनायास पकड़ी। पुत्रके समान मेरे इस भतीजेने इसे छुपानेकी जो कोशिश की थी वह बेकाम हुई। फिर तो उनके पछतावेका पार न रहा अब तो वे गला फाड़ कर बुरी तरह रोते हैं। फिलहाल उन्होंने अपनी खुशी से मन्दिर भी छोड़ दिया है। लेकिन मैं यह आशा लगाये बैठा हूँ कि चित्त शुद्ध करनेके बाद वे फिर लौटेंगे। अगर वे शुद्ध हो जायेंगे तो मन्दिर उनका स्वागत करेगा। उन्होंने जो चोरियाँ की हैं वे सब मामूली थोड़े-से पैसोंकी और छोटी, हलकी चीजोंकी हैं। चोरीकी रकमका खयाल करते हुए मैंने इसे छगनलाल गांधीका एक रोग माना है। इस चोरीसे मन्दिरको आर्थिक नुकसान हुआ हो, सो नहीं। छगनलाल गांधीने लगभग दस हजार रुपये बचाये थे। कैसे, सो तो अभी नहीं बताऊँगा। कुछ ही महीने हुए, उन्होंने यह रकम, मेरे कहनेसे, मन्दिरको दे डाली थी। इस दानमें उदारता नहीं थी, सिर्फ धर्म-पालन था। अपरिग्रहके व्रतका पालन करनेवालोंके पास अपनी निजकी मिल्कियत नहीं होती। छगनलालके पास वह देखी गई। यह बात मुझे खटकी छगनलालने, उनकी पत्नीने, उनके दोनों लड़कोंने कबूल किया कि यह धन अपने पास नहीं रखा जाना चाहिए। इस कारण यह सब रकम मन्दिरको मिली। मैं मानता हूँ कि अब छगनलालके पास उनके पिताजीकी मिल्कियतके हिस्सेके सिवा
- ↑ छगनलाल जोशी।