कुछ भी नहीं रहा है। जब मैं छगनलाल गांधीकी तीस बरसकी सेवाका और उनकी सरलताका विचार करता हूँ तो इस चोरीके कारणको समझ नहीं सकता। प्रकृति बलीयसी है। यह तो मेरी शर्मकी एक बात हुई।
अब दूसरी सुनिए। 'आत्मकथा' में मैने कस्तूरबाईकी बहुत तारीफ की है। मेरे जीवनके बड़े-बड़े परिवर्तनोंमें, इच्छासे या अनिच्छासे, उसने मेरा साथ दिया है। मैं मानता हूँ कि उसका जीवन पवित्र है, उसने समझ-बूझ कर नहीं, लेकिन केवल पत्नी-धर्मका खयाल करके यह सब त्याग किया है। मेरे त्यागमें उसने कभी रुकावट नहीं डाली। मेरी बीमारीमें मेरी सेवा करके उसने मुझे कितना सुख दिया, किन्तु उसे कष्ट देने में मैंने कोई कमी नहीं की। मैं यह कह सकता हूँ कि उसने ब्रह्मचर्यके पालनमें न केवल मेरी मदद की है, बल्कि मेरी रक्षा भी की है। इन गुणोंको आच्छादित कर देनेवाले दोष भी उसमें हैं। उसने पत्नी-धर्म समझ कर उसके पास जो धन आदि था सो तो दे डाला, फिर भी उसमें कुछ ऐसा क्षुद्र मोह रह गया है जो समझ में नहीं आता। इसी कारण उसने एक साल या उससे कुछ पहले जुदे-जुदे लोगों से जुदे-जुदे मौकोंपर मिले हुए सौ या दो सौ रुपये इकट्ठे कर रखे थे। नियम तो यह है कि कोई उसके निजके लिए भी कुछ दे जाये तो वह उसे भी रख नहीं सकती। इस कारण ऊपर की इकट्ठी की हुई रकम चोरीकी रकम ही हुई। उसकी और मन्दिरकी खुशनसीबीसे एक बार मन्दिरमें चोर आये। उन्हें तो कुछ नहीं मिला, लेकिन इस बहाने कस्तूरबाईकी चोरी प्रकट हो गई। उसे शुद्ध पश्चात्ताप हुआ लेकिन वह क्षणिक साबित हुआ। उसका सच्चा हृदय परिवर्तन नहीं हुआ था; पैसा जोड़नेका मोह अभी छूटा नहीं था। कुछ दिन पहले कुछ अपरिचित भाई उसे चार रुपये भेंटके नामसे दे गये। नियमानुसार इन रुपयोंको आफिस में जमा करानेके बदले उसने अपने पास रख छोड़ा। एक जिम्मेवार आश्रमवासीने यह सब देखा था; उनका धर्म तो यह था कि वह कस्तूरबाईको सावधान कर देते। लेकिन झूठी मर्यादाके कारण वह इस पापके साक्षी बने रहे। छगनलाल गांधीके किस्सेके बाद मन्दिरवासियोंकी आँखें खुलीं। कस्तूरबाईकी चोरीके साक्षीने छगनलाल जोशीको खबर दी। जोशी कतूरबाईके पास काँपते-काँपते पहुँचे। कस्तूरबाई समझ गई। उसने दीनतापूर्वक रुपये दे दिये और वचन दिया कि आगेसे ऐसा नहीं होगा। मैं जानता हूँ कि उसका पछतावा सच्चा है लेकिन अब अगर पहले किया हुआ कोई दूसरा पाप प्रकट हो या भविष्य में ऐसा कोई पाप करनेपर वह प्रकट हो जाये तो कस्तूरबाईने प्रतिज्ञा की है कि वह मुझे और मन्दिरको छोड़ देगी। मन्दिरने उसके पश्चात्तापको स्वीकार किया है। अब वह मन्दिरमें एक निर्दोष व्यक्ति मानी जायेगी और अगर लोग निभा लेंगे तो मौके-ब-मौके मेरे साथ मुसाफिरी भी करेगी।
अब तीसरी घटना सुनिए। मन्दिर में तीन साल पहले एक विधवा बहन रहती थी। हम सब उसे पवित्र मानते थे। उन्हीं दिनों आश्रममें एक नौजवान भी रहते थे। उनका पालन-पोषण किसी अनाथालय में हुआ था। उन्हें भी हम सब अच्छा समझते थे। उस समय वह कुँवारे थे। उक्त विधवा बहनके साथ वह पतित हुए।