मनमाने हिज्जे करनेका अधिकार नहीं है। मैं अपने जैसे अधूरी गुजराती जानने-वालोंको इस कोशकी मदद लेकर ही अपनी चिट्ठी-पत्री लिखनेकी सिफारिश करता हूँ।
इस कोशमें ४३,७४३ शब्द हैं। कोशकी रचना, उसमें आये हुए शब्दोंके हिज्जोंके नियमों आदिके बारेमें लिखना नहीं चाहता। सब लोग कोश खरीदकर यह ब्योरा जान लें। जिन अमीरोंको भाषाका शौक हो, उन्हें चाहिए कि वे अपने हरएक गुमाश्ते को यह कोश देकर उसे तदनुसार गुजराती लिखनेका सब काम करने को कहें।
संचालकोंने आत्मविश्वासकी कमी के कारण पहला संस्करण सिर्फ ५०० प्रतियोंका निकाला है। मुझे उम्मीद है कि यह संख्या तो 'नवजीवन' के ग्राहकोंको भी पूरी नहीं पड़ेगी। कोशकी लागत कीमत पौने चार रुपया पड़ी है; फिर भी उसका विक्रय मूल्य तीन रुपया रखा गया है। जिल्द पक्की बंधी है और कोशमें ३७३ पृष्ठ हैं। मुझे आशा है कि भाषा-प्रेमी गुजराती कोशको तुरन्त खरीदकर संचालकोंके आत्म-विश्वासकी कमी दूर कर देंगे और शब्दकोशके प्रति अपनी सहानुभूति सिद्ध कर दिखायेंगे।
नवजीवन, ७-४-१९२९
१९३. पत्र: मीराबहनको
स्थायी पता:
सत्याग्रह आश्रम
साबरमती
७ अप्रैल, १९२९
तुम्हारा पत्र मुझे बम्बई में मिला। बैजवाड़ा भेजा हुआ तुम्हारा पत्र पता बदल कर मेरे पास यहाँ हैदराबाद भेज दिया गया है। यहाँसे मैं आज शामको रवाना हो रहा हूँ।
तुम्हारा आखिरी पत्र चिन्ताप्रद है। तुम्हें समय-समयपर बुखार आ ही जाता है। इसकी चिन्ता तो न करो, मगर उपेक्षा भी न करो। अगर वहाँ तुम्हारा स्वास्थ्य अच्छा नहीं रह सकता, तो तुम्हें स्थान परिवर्तन कर ही देना चाहिए। कुछ दिन कुनैन लेना अच्छा हो सकता है। तुम्हें नींबू पटना या कलकत्ता जहाँसे भी मिल सकें मँगा लेने चाहिए। मुझे आशा है कि तुम मच्छरदानी नियमपूर्वक काममें ले रही हो। अगर तेल माफिक न आता हो तो न लो। अगर तुम्हें अच्छा घी न मिल सके, तो मैं तुम्हारे लिए भेज सकता हूँ । सार यह कि तुम्हें अपने शरीरको धरोहर समझकर उसके लिए जिस चीजकी भी जरूरत हो ले लेनी चाहिए।
हाँ, नरम तकुओंके लिए गुजरातमें मेरे सिवाय तुम्हारा कोई समर्थक नहीं है। लेकिन मेरी वकालतका आधार अज्ञान है। मैं तो उसकी वकालत इसलिए करता हूँ क्योंकि वह मुझे पसन्द है। ४०-१५