सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/२५९

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।

१९७. पत्र: छगनलाल जोशीको

मौनवार [८ अप्रैल, १९२९]

चि० छगनलाल,

आज बैजवाड़ा पहुँचना था किन्तु वेंकटप्पैया और उसके साथियोंने दूसरा ही निर्णय किया। बैजवाड़ाके इस ओर तीन स्टेशन पहले रातके तीन बजे मुझे उतार लिया और वहाँसे फौरन मोटरमें २० मील दूर एक जमींदारके गाँवमें ले आये। इस समय सुबहके नौ बजे हैं। रास्तेमें लगभग एक मील लम्बा नदीका रेतीला पाट पड़ा, मोटरको भैंसेसे जोतकर खींचना पड़ा। मैं तो खूब थका हुआ था। मोटरमें ही सो गया। हैदराबादसे भी तुम्हें पत्र लिखा था। मिला होगा।

शा... का []किस्सा उलझता जा रहा है। तुम धीरज रखना, घबराना नहीं। दूसरोंको इसकी चर्चा करनेसे रोकना। इस पूरे किस्सेसे हम सोख सकेंगे कि प्रेम क्या है। मोह और प्रेमका भेद समझेंगे और अपने आपको शुद्ध भी कर सकेंगे।

तुम्हारा कोई पत्र तो मिला नहीं है; इसलिए और कुछ नहीं लिख रहा हूँ। हैदराबादसे वामन नायककी हुंडी मिलेगी। उसे भी अभी रोककर रखना। इसमें भी किसी विशेष कामके लिए अंकित रकम थोड़ी ही रहेगी।

बापूके आशीर्वाद

गुजराती (जी० एन० ५५६१) की फोटो-नकलसे।

१९८. तार: मीराबहनको

बैजवाड़ा
९ अप्रैल, १९२९


मीराबाई
खादी डिपो
मधुबनी
यहाँ पहुँचनेपर चार और पाँच के पत्र मिले, तार भी; ईश्वरको धन्यवाद है; जो भी खर्च हो दूध और नींबू जरूर लो। दो खुराकोंमें

  1. नाम नहीं दिया गया है।