तुम अपने शरीर या मस्तिष्कपर बेजा बोझ न डालना।
मैं अब भी तुम्हें अपना कोई निश्चित कार्यक्रम बतानेमें असमर्थ हूँ। स्वागत
समिति अभीतक निश्चय नहीं कर पाई है कि वह मुझे कहाँ-कहाँ ले जायेगी। इसलिए सदर मुकाम बैजवाड़ा ही रहता है।
बापू
६ तारीखको[१] तुमने बुखारके कारण उपवास नहीं किया। मैं इसलिए न कर सका कि कामकी व्यग्रतामें याद ही नहीं रहा, हालांकि पहले मुझे उसका खयाल था। दौड़ाभागी बुरी है। यह भुलक्कड़पन अच्छा लक्षण नहीं है।
सौजन्य: मीराबहन
२०१. पत्र: छगनलाल जोशीको
बैजवाड़ा
९ अप्रैल, १९२९
कलकी डाक मिल गई होगी। यहाँ पहुँचनेपर तुम्हारे दो पत्र मिले। हम अपनी पूँजी नहीं गँवा बैठे हैं; उसमें जितनी खोट थी उतनी चली गई; इसमें शोक या दुख किस लिए? हमारा भार हलका हो गया। काम तो करेंगे ही। पाप। किया था, इतना ही कहनेको बच रहे तो भी मान सकते हैं कि बहुत कमाया। डर तो इस बातका है कि पापका घड़ा पूरा नहीं फूटा है और फिरसे नहीं भरेगा इसका कोई भरोसा नहीं है। किन्तु ऐसा भरोसा दे कौन सकता है? हम तो प्रयत्न करते रहें; जहाँ बुराई दिखाई दे, उसे दूर करते जायें। जहाँतक लोग हममें विश्वास करेंगे, हम उनकी सेवा करते रहेंगे। सच तो यह है कि इससे लोगोंके स्नेहमें शायद ही कुछ परिवर्तन हो। शायद वे पहलेसे भी अधिक उदार हो बनें, जो होगा, उसे देख लेंगे।
...के[२] विषयमें मेरा पत्र मिला होगा। वह निर्दोष ही है, ऐसा मैं नहीं कह सकता।...के[३] बारेमें मुझे शंका नहीं है।...का मन विषयासक्त हो तो कहा नहीं जा सकता। पर उसपर यों शक नहीं कर सकते हैं। वह जो कहता है हमें उसीको मान लेना चाहिए। गोशालामें तो वह काम नहीं करेगा। किन्तु अब...[४]आ गया है इसलिए हमारा बोझ कम होगा।