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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/२६९

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डेकके मुसाफिर २३९ मेरे पास अभी एक तीसरा काम बकाया पड़ा है, और मैं बड़ी प्रसन्नतापूर्वक अपंग निर्धनोंके लिए एक औद्योगिक केन्द्रका उद्घाटन करता हूँ । [ अंग्रेजीसे ] हिन्दू, ११-४-१९२९ २०९. डेकके मुसाफिर मैंने रेलगाड़ीके तीसरे दर्जे में और समुद्री जहाजके डेकपर फिरसे मुसाफिरी करना शुरू कर दिया है । फलस्वरूप पुराने अनुभव थोड़े फेरबदलके साथ फिरसे ताजा हो रहे हैं । जब मुझे लोग बिल्कुल नहीं जानते थे, उस समय मैं आसानीसे लोगों में हिलमिल जाता था और उनके सुख-दुखमें भी पूरी तरह भागीदार होता था । अब मैं एक प्रतिष्ठित 'अछूत' बन गया हूँ । अब लोग कर्त्तव्य समझकर मेरे लिए जगह बना देते हैं और मुझे ऐसी सहूलियतें देते हैं, जैसी मेरे दूसरे साथी मुसा- फिरोंको नहीं देते। इसलिए जब बर्मा जाते समय मैं एस० एस० 'एरोंडा ' जहाजपर चढ़ा और उसके तीसरे दर्जे (डेक) का मुसाफिर बना तो मुझे अपने सब साथियोंसे अलग कर दिया गया। बर्मा जाते समय जहाजके अधिकारियोंने भी यात्रियोंसे मुझे अकेला छोड़ देनेके बारेमें थोड़ी गुफ्तगू-सी कर ली थीं। उन्होंने डेककी दूसरी सलूनवाला कुछ भाग मेरे लिए अलग रख दिया था और उनका आग्रह था कि मैं उसी सलूनके पाखानोंका इस्तेमाल करूँ । इस कारण डेकपर मुसाफिरी करने- वालोंको क्या-क्या अड़चनें होती हैं, मैं उन्हें बहुत कम जान पाया । बर्मासे वापस आते समय भी संयोगवश उसी जहाजपर आना पड़ा था, लेकिन इस बार जहाजके अधि- कारियोंने कोई खास इन्तजाम नहीं किया था, फलस्वरूप मैं डेकके मुसाफिरोंके बीच जा पड़ा था, उनमें हिल-मिल सका था। इसमें शक नहीं कि महात्मापन के कारण यहाँ भी सामान्य यात्रियोंके अनुभवोंसे मैं वंचित ही रहा, फिर भी मैं लोगोंकी कठिनाइयों में काफी-कुछ भागीदार बन सका । इस बार मुझे जहाजके सबसे निचले दर्जेकी यात्राके बारेमें जो अनुभव मिला उसके आधारपर मैं कह सकता हूँ कि रेलगाड़ीकी भाँति जहाजों में भी सन् १९१५ और १९२९ की मुसाफिरीके बीच मुझे कोई खास फर्क नहीं दीख पड़ा । इस बार भी जहाजमें मैंने पहले जैसा ही शोरगुल देखा, वैसी ही लापरवाही या उपेक्षा देखी, वैसी ही भीड़-भाड़, वैसी ही गन्दगी और बदबू देखी । 'एरोंडा' जहाजपर मैंने देखा कि मुसाफिरोंके लिए सुरक्षित जगह में मोटरगाड़ियाँ, मुर्गे-मुर्गियाँ और मवेशी भर दिये गये थे । मुसाफिरोंकी भलाई और उनकी भावनाओंकी ऐसी घोर उपेक्षासे मुझे बहुत दुख हुआ । वास्तव में मैंने देखा कि जहाजके मालिक लोग मानव-यात्रियोंके मुकाबले अन्य माल तथा पशु-पक्षियोंकी ज्यादा अच्छी देखभाल करते हैं। क्योंकि अगर उनकी सार-सँभाल में लापरवाहीसे काम लिया जाये तो जहाजके अधिकारियों को उनकी वजहसे आर्थिक नुकसान होने का डर बना रहता है । जहाजके पाखाने इतने गन्दे थे कि उनका बयान नहीं किया जा सकता । पाखानोंतक पहुँचने में मेरी बुरी तरह परीक्षा हो जाती थी;