डेकके मुसाफिर २४१ और न कोई दूसरा इन्तजाम ही है । इस कारण मुसाफिर जहाजके फर्शपर ही थूकते हैं, पानकी पीक थूकते हैं, नारंगीके छिलके और दूसरी रद्दी चीजें डालते हैं। मेरी रायमें यह डेक मनुष्योंके बजाय ज्यादासे ज्यादा मवेशियोंका बाड़ा हो सकता है । मुख्य डेकका सबसे अगला हिस्सा कभी-कभी आंशिक रूपसे मवेशियोंके बाड़ेके रूपमें प्रयुक्त किया जाता है, जैसा कि जब हम पिछली बार कलकत्तासे रंगून गये थे तब किया गया था। मवेशियोंके इस बाड़े और मुसाफिरोंके स्थानके बीच लकड़ीकी पटियोंकी एक बाड़ लगा दी गई है। इसी तरह जहाजके पिछले हिस्से में छायादार डेकपर एक पिंजरा है, जिसमें भेड़, बकरी, बत्तख और मुर्गा-मुर्गी वगैरा रखे रहते हैं । यह स्थान इतना गन्दा और दुर्गन्धपूर्ण है कि उसके आसपास भी खड़ा हो सकना नामुमकिन है । इस जहाजमें तीसरे दर्जेके मुसाफिरोंके लिए दवाखानेका कोई इन्तजाम नहीं दीख पड़ता। अगर तीसरे दर्जेका कोई मुसाफिर बीमार पड़ जाये या कोई संक्रामक रोग फैल जाये तो मरीजोंको अलग रखनेकी कोई खास व्यवस्था भी इसमें नहीं है । एस० एस० 'एरोंडा' जहाज जिस कम्पनीका है वह दुनिया की सबसे बड़ी कम्पनियों में से एक है । अतः अगर वह चाहे तो डेकके मुसाफिरोंके आरामके लिए अच्छा और सुन्दर इन्तजाम कर सकती है । पहली और दूसरी सलूनमें तो इस तरह के बढ़ते हुए सुधार मैं देख सका था, हालाँकि स्पष्टतः मैं उनकी न्यानपूर्वक जाँच नहीं कर सकता था । जो परिवर्तन हुए थे वे इतने स्पष्ट थे कि स्वतः नजरमें आते थे। ऐसी हालत में कोई वजह नहीं है कि डेकपर मुसाफिरी करनेवाले लोगोंके, जिनसे वस्तुतः जहाज कम्पनीको सलूनके यात्रियोंके मुकाबले ज्यादा पैसा प्राप्त होता सुख और आरामके लिए अच्छे स्थानका इंतजाम न किया जाये । मुसाफिरोंने मुझसे कहा था कि सालके इन दिनोंमें तो डेकपर सफर करना उतना कठिन नहीं होता, लेकिन बरसात के दिनोंमें, जब कि ऊपरी डेक लगभग बेकाम हो जाता है, मुसाफिरोंको अवर्णनीय कष्ट सहने पड़ते हैं; उनमें से अधिकांश तो बीमार पड़ जाते हैं और कई तो यात्राकी तकलीफोंके कारण प्राण छोड़ देते हैं। किसी भी जहाजरानी कम्पनीके लिए यह एक कलंक है; पी० ऐंड ओ० और बी० आई० एस० एन० कम्पनियों जैसी पैसेवाली और दुनिया-भर में मशहूर कम्पनी के लिए तो यह दोहरे कलंककी बात है । जहाजके मालिकों और मैनेजरोंको यह समझ लेना चाहिए कि दिन-ब-दिन डेकपर मुसाफिरी करनेवाले पढ़े-लिखे और चतुर लोगोंकी संख्या बढ़ती जा रही है । कम्पनीका यह फर्ज है कि वह उनकी जरूरतों और उम्मीदोंको पूरा करनेका इन्तजाम करे । [ अंग्रेजीसे ] यंग इंडिया, ११-४-१९२९ १. कम्पनीके उत्तर तथा उससे सम्बन्धित गांधीजीके विचारोंके लिए देखिए "बी० आई० एस० एन० कम्पनी द्वारा प्रतिवाद", २५-४-१९२९ और " एक कुत्सित दोषारोप, २-५-१९२९ । ४०-१६
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