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पृष्ठ:सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय Sampurna Gandhi, vol. 40.pdf/२८६

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सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय

है । मुझे एक ऐसी एकता रखनेवाली कांग्रेसके दर्शन कराइए जिसमें रुपये-पैसेका ठीक-ठीक हिसाब रखा जाता हो, जिसके करोड़ों ग्रामीण सदस्य हों, हरेक गाँवमें जिसने खादी भण्डार खोल रखे हों, जिसे हरेक व्यक्तिके सम्मानकी फिक्र हो, जिसने अस्पृ-श्यताके कलंकको धो डाला हो, जिसने हिन्दू और मुसलमान, पारसी, ईसाई, यहूदी और सिखोंमें एकता स्थापित कर दी हो; -- ऐसी कांग्रेसके दर्शन कराइए और तब आप देखेंगे कि इस देशका प्रतिनिधित्व करनेवाले किसी स्पीकरके अधिकारकी अवहेलना या अवज्ञा करनेका दुस्साहस कोई वाइसराय नहीं कर सकेगा ।

[ अंग्रेजोसे ]
यंग इंडिया, २५-४-१९२९
 

२२५. टिप्पणियाँ

श्री मंचरशा अवारी

पाठक जानते हैं कि श्री मंचरशा अवारी नागपुर जेलमें हैं । उनके भाई लिखते हैं:[]

मैंने श्री अवारीको पत्र लिखा है, लेकिन फिर क्या हुआ सो सफरपर होनेके कारण मालूम नहीं कर सका हूँ । इस बारेमें में स्थानीय कांग्रेसको भी सलाह दे चुका हूँ। मेरी राय में, जेलमें सत्याग्रही कैदीको खादीके कपड़ोंका आग्रह नहीं करना चाहिए। सत्याग्रहीको चाहिए कि वह जेलके सामान्य नियमोंको न तोड़े। लेकिन जब अपमान-जनक व्यवहार किया जाये, बेहद जुल्म हो, धर्मपर आँच आती दिखे या जिस कामके न करनेके कारण दण्ड मिला हो, वही काम जबर्दस्ती कराया जाये तो अवश्य ही नियमोंकी सविनय अवज्ञा की जा सकती है । जैसे जेलर गालियाँ दे, अखाद्य खूराक खानेको दे, मैले कपड़े पहननेको दे, तब विरोध किया जा सकता है । या जब बाहर खादी पहननेको अपराध मानकर सजा दी गई हो और जेलमें खादीकी जगह विदेशी कपड़े पहननेको दिये जाते हों तो खादी पहननेका आग्रह करना उचित है, वह किया जाना चाहिए। श्री अवारीको खादी पहननेके जुर्मपर जेलकी सजा नहीं मिली है । इस कारण मेरी राय में जेलमें उनका खादीके लिए जिद करना ठीक नहीं है। साथ ही मैं यह भी मानता हूँ कि अगर जेलके अधिकारी श्री अवारीको बाहरसे खादी मँगाकर पहनने से मना करते हों, तो वे अन्याय करते हैं और श्री अवारोका आग्रह तोड़ने की उनकी जिद अनुचित है । मैं आशा करता हूँ कि श्री अवारीको खादी न देने में कोई दूसरा और खास कारण होगा। इस वारेमें स्थानीय नेता ठीक-ठीक जाँच करें तो अच्छा हो ।

  1. १. यहाँ नहीं दिया गया है। श्री मंचरशा जेलमें भी खादोके कपड़े पहनना चाहते थे किन्तु जेलके सुपरिंटेंडेंट द्वारा वैसी सुविधाके अभावमें वे सारा दिन नंगे बदन रहते थे। पत्र लेखकने इस विषय में गांधीजीकी राय ली थी। देखिए खण्ड ३७, पृ४ ४५ भी ।