इस पत्रके लेखकमें पहले जितनी निराशा और जितना अविश्वास था, किसी दूसरे नौजवान में शायद ही उतनी निराशा और उतना अविश्वास हो । दोषोंने उसके शरीर में घर कर लिया था । लेकिन आज उसमें जिस श्रद्धाका उदय हुआ है, उससे नवयुवक जगतमें आशाका संचार होना चाहिए। जो लोग अपनी इन्द्रियोंको जीत सके हैं उनके अनुभवपर भरोसा करके लगनके साथ 'रामायण' वगैराका अध्ययन करनेवालेका दिल पिघले बिना रह ही नहीं सकता । मामूली विषयोंके अध्ययनके लिए भी जब हमें अक्सर बरसोंतक मेहनत करनी पड़ती है, कई तरकीबोंसे काम लेना पड़ता है, तो जिसमें सारी जिन्दगोकी और उसके बादकी शान्तिका भी रहस्य छुपा हुआ है, उसके अध्ययनके लिए हममें कितनी लगन होनी चाहिए ? तिसपर भी जो लोग बहुत ही थोड़ा समय और ध्यान देकर 'रामायण' तथा 'गीता 'में से रसपान करनेकी आशा रखते हैं, उनके लिए क्या कहा जाये ?
ऊपरके पत्रमें लिखा है कि अपने स्वस्थ होनेका खयाल आते ही विकार फिरसे प्रबल हो जाते हैं । जो बात शरीरके लिए ठीक है वही मनके लिए भी ठीक है । जिसका शरीर बिलकुल चंगा है उसे अपने स्वस्थ होनेका खयाल कभी आता ही नहीं, न उसकी कोई जरूरत ही है, क्योंकि तन्दुरुस्ती तो शरीरका स्वभाव है । यही बात मनपर भी लागू होती है । जिस दिन मनकी तन्दुरुस्तीका ख्याल आये, समझ लो कि विकार पास आकर झाँक रहे हैं । अतः मनको हमेशा स्वस्थ बनाये रखनेका एकमात्र उपाय उसे हमेशा अच्छे विचारोंमें लीन रखना है । इसी कारण रामनाम वगैराके जपकी बातकी शोध हुई और वे गेय माने गये। जिसके हृदयमें हर घड़ी रामका निवास हो उसपर विकार चढ़ाई कर ही नहीं सकते । सच तो यह है कि जो शुद्ध बुद्धिसे रामनामका जप करता है, समय पाकर रामनाम उसके हृदयमें घर कर लेता है । इस तरह हृदय में प्रवेश होनेके बाद रामनाम उस मनुष्यके लिए एक अभेद्य किला बन जाता है । बुराईको सोचते रहनेसे वह नहीं मिटती; अच्छाईका विचार करनेसे बुराई जरूर मिट जाती है । लेकिन बहुत बार देखा गया है कि लोग अच्छी नीयत से भी उलटी तरकीबोंको काममें लाते हैं । यह बुरा विचार कैसे आया, कहाँसे आया ? आदि सोचनेसे कुविचारका ध्यान बढ़ता जाता है । बुराईको मेटनेका यह उपाय हिंसक कहा जा सकता है । इसका सच्चा उपाय तो बुराईसे असहयोग करना है । जब बुराई हमपर आक्रमण करे तो उससे 'भाग जा' कहनेकी कोई जरूरत नहीं; हमें तो यह समझ लेना चाहिए कि बुराई नामकी कोई चीज है ही नहीं; हमेशा स्वच्छताका, अच्छाईका विचार करते रहना चाहिए। 'भाग जा' कहनेमें डरका भाव है । उसका विचारतक न करनेमें निडरता है । हमें सदा यह विश्वास बढ़ाते रहना चाहिए कि बुराई मुझे छू तक नहीं सकती । अनुभव द्वारा यह सब सिद्ध किया जा सकता है ।
- [ गुजरातीसे ]
- नवजीवन, १४-४-१९२९