२३१. पत्र : गंगाबहन वैद्यको
रविवार, १४ अप्रैल, १९२९
छगनलालने मुझे लिखा है कि तुम कभी-कभी आश्रमके दोषोंको देखकर व्याकुल हो जाती हो और कहीं जाना चाहती हो ।
यदि तुम्हारे ध्यानमें कोई ऐसी जगह हो जो पूर्णतया दोषमुक्त हो तो हम दोनों ही वहाँ चले जायें। किन्तु यदि तुम यह मानती हो कि दोष तो सभी स्थानोंमें थोड़े-बहुत होंगे ही तो तुम, मैं या जो भी व्यक्ति अपनेको आश्रमका अंग मानता है वह आश्रममें बने रहकर उसे शुद्ध करे, इसीमें उसके जीवनकी सार्थकता है । दोषोंको बर्दाश्त कर सकना आश्रमकी अपनी प्रकृति है; और उसकी विशेषता यह है कि वह दिन-प्रतिदिन इस दिशा में विकास कर रहा है ।
सामान्यतया जीवनमें तो होता यह है कि लोग बुराई देखते हैं तो उसपर पर्दा डाल देते हैं । यही आम चलन है; इसलिए संसारमें बुराइयाँ बढ़ती हैं । परन्तु बुराइयाँ बढ़नेपर भी जगतका स्वभाव शुद्ध बने रहना ही है । इसीलिए तो वह चल रहा है । नहीं तो वह कभीका नष्ट हो गया होता । यह सब सोचकर तुम दृढ़ बनो और निश्चित तथा शान्त रहो । शरीरको स्वस्थ बनाओ। थोड़ा कच्चा शाक खाती हो न ? कितना दूध पच जाता है ?
बापूके आशीर्वाद
- [ गुजरातीसे ]
- बापुना पत्रो - ६ : गं० स्व० गंगाबहेन ने
२३२. पत्र : मीराबहनको
१५ अप्रैल, १९२९
तुम्हारे दोनों पत्र मुझे मिल गये । तुम्हें मैं वचन देता हूँ कि अगर मुझे कुछ हो गया, तो तुम्हें तारसे सूचना मिल जायेगी । इसलिए जबतक मेरी ओरसे पुष्टि न हो जाये, तबतक तुम्हें तमाम अफवाहोंको निराधार समझकर माननेसे इनकार कर देना चाहिए। आश्रमकी बात तो तुम जानती हो हो ।[१] ये घटनाएँ मुझे मेरे कामसे विरत नहीं कर सकी हैं। मनके अन्तरालमें कोई चीज अनुभव होती है, लेकिन वह
- ↑ १. देखिए "मेरा दु:ख, मेरी शर्म", ७-४-१९२९ ।