२३४. पत्र : छगनलाल जोशीको
१५ अप्रैल, १९२९
यह सब इतनी गतिसे हो रहा है कि सारी बात एकाएक मैं समझ नहीं पा रहा हूँ । तुमने लिखा है कि शा...[१] जा रही है । कहाँ और किस प्रकार, यह शायद तुमने इससे पहले लिखा होगा; वह पत्र अभी नहीं मिला है । क्योंकि आज दो पत्र मिलने चाहिए थे । किशोरलालका पत्र आया है उससे अनुमान लगाता हूँ कि ह...[२] के पास जायेगी । यह भी ठीक है। मनुष्य अपने-आप हमारी किसी त्रुटिके बिना चले जायें तो उससे हमें घबराना नहीं है । वे हमारा त्याग करें तो उसके लिए भी हम योग्य हैं । जो कुछ हम कर रहे हैं वे उसको समझ सकें तो रहें। कम व्यक्ति हो जानेसे तुम्हारे काममें कुछ कठिनाई आती हो तो बड़े विद्यार्थियोंसे काम लेना । किसी विभागका काम कम करना हो तो मजेसे कर सकते हो। अपनी सामर्थ्यसे बढ़कर काम करनेके कारण हम पिछड़ें, ऐसा नहीं होने देना चाहिए ।
कृष्णदास अब स्वस्थ हो और उसे बुलाया जा सके तो बुला लेना । कान्ति, बाल, जयन्ती इनमें से जिससे तुम ठीक समझो काम लेनेमें मुझे कोई दोष नहीं दिखाई देता । सीतलासहायकी सहायता तो ली ही जा सकती है । रमणीकलाल लापरवाह क्यों हो गया है ?
बापूके आशीर्वाद
- [ पुनश्च : ]
इसके साथ प्रभुदासका पत्र भेज रहा हूँ । कार्यवाहक मण्डल इसे पढ़ ले । काकाको दिखा देना ।
- गुजराती (जी० एन० ५४०४ ) की फोटो - नकलसे ।